आख़िर कैसे चलता है दवाओं की बिक्री का 'गोरखधंधा'?

20 December, 2013 5:51 AM

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आख़िर कैसे चलता है दवाओं की बिक्री का 'गोरखधंधा'?

दवाओं की बिक्री को बढ़ाने के लिए डॉक्टरों को किए जाने वाले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भुगतान को बंद करने के ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन के ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद भारत के दवा बाज़ार के कारोबारी तौर तरीक़ों से जुड़े सवाल अचानक उभर कर सामने आ गए हैं.

ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन (जीएसके) दुनिया के छठे नंबर की और ब्रिटेन की सबसे बड़ी दवा निर्माता कंपनी है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कंपनी के हवाले से बताया है कि जीएसके न तो अपने मार्केटिंग स्टाफ को किसी तरह का कारोबारी लक्ष्य देगी और न ही डॉक्टरों को मेडिकल कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए कोई भुगतान करेगी.

लेकिन ऐसे में ये सवाल उठने लगा है कि क्या अन्य दवा निर्माता कंपनियाँ जीएसके के इस फ़ैसले को भारत में अपना पाएंगी? भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ इन कारोबारी तरीक़ों से किस तरह प्रभावित हैं, इसकी पड़ताल की बीबीसी हिन्दी ने.

इसी सिलसिले में बिहार के बेगूसराय जिले के डॉक्टर विद्यापति राय ने स्थानीय पत्रकार मनीष शांडिल्य को बताया कि भारत में दवा कंपनी चाहे छोटी हो या बड़ी, उनमें से कई अपनी दवाओं की बिक्री के लिए डॉक्टरों को अलग-अलग तरीक़े से उपकृत करती हैं.

ज़्यादातर मामलों में कंपनियां सामान या फिर देश-विदेश की मुफ्त सैर करने की पेशकश करती हैं.

कुछ कंपनियां तो नकद पैसों का प्रस्ताव भी देती हैं. किस डॉक्टर को क्या या फिर कितना मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी प्रैक्टिस कितनी चलती है और पेशकश करने वाली कंपनी कौन सी है?

लेकिन इस पूरे मामले का एक पहलू यह भी है कि दवा कंपनियां डॉक्टरों के साथ-साथ अस्पतालों और स्वास्थ्य महकमे से जुड़े अफसरों को भी प्रलोभन देती हैं.

कई डॉक्टर पैसे लेकर दवाएँ लिखते हैं और वे इसे गलत भी नहीं मानते लेकिन इसका ख़ामियाज़ा सिर्फ़ और सिर्फ़़ मरीज़ की जेब और उनकी सेहत को उठाना पड़ रहा है.

उन्होंने बताया कि दवा कंपनियां उपकृत कर या फिर सीधे पैसे देकर दवाओं की ज़्यादा-से-ज़्यादा बिक्री सुनिश्चित करने में लगी रहती हैं.

मोटे अनुमान के अनुसार छोटी कंपनियां अपने बजट का 20 से 30 फ़ीसदी और बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां पांच से 10 फ़ीसद हिस्सा मार्केटिंग पर खर्च करती हैं.

साल 2009 के दिसंबर में मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने डॉक्टरों के लिए आचार संहिता बनाई थी जिसके बाद डॉक्टरों को उपकृत किए जाने का तरीक़ा बदला है.

अब ऐसी मार्केटिंग को बढ़ावा देने वाले डॉक्टर अमूमन नकद की मांग करते हैं और ऐसा नहीं हो पाने की सूरत में अपने परिजनों या दोस्तों के नाम पर सामान या अन्य सुविधाएं लेते हैं.

छत्तीसगढ़ में स्थानीय पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल ने बिलासपुर शहर के सर्जन डॉक्टर चंद्रशेखर रहालकर से बात की.

डॉक्टर रहालकर कहते हैं कि उन्होंने 1996 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को चिट्ठी लिख कर कहा था कि डॉक्टर दवा कंपनियों के प्रलोभन में आ कर ग़ैरज़रूरी दवाएं न लिखें, इस पर रोक लगाने के लिये क़दम उठाए जाएं.

वो कहते हैं कि ऐसी मांग उन्होंने कई बार कई मंचों पर उठाई लेकिन ज़ाहिर तौर पर इसमें किसी की दिलचस्पी नहीं है.

डॉक्टर रहालकर कहते हैं,"मैं पिछले 27 साल से हर्निया के ऑपरेशन में साधारण नायलोन की मच्छरदानी का टुकड़ा इस्तेमाल करता हूं, जिसकी कीमत एक रुपए बैठती है. किसी कंपनी की जाली खरीदें तो वो 2,000 रुपए की आती है."

"कई ऑपरेशन में केवल स्टेपल का खर्चा 75 हज़ार रुप आते हैं. मैं मछली मारने के काम में आने वाला धागा इस्तेमाल करता हूं, जिसकी क़ीमत केवल 15 रुपए होती है."

उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार को इसकी जाँच करवानी चाहिए कि जीएसके के बयान में कितनी सच्चाई है.

भारत में हर साल कई मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव दवा कंपनियों के सेल्स टारगेट के दबाव में ख़ुदकुशी कर लेते हैं. इसे रोका जाना चाहिए.

लखनऊ मे कार्यरत मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव विजय बर्नवाल ने स्थानीय पत्रकार मनीष कुमार मिश्रा को बताया कि कुछ स्थानीय दवा निर्माता कंपनियाँ तो अपनी दवाओं की बिक्री होने पर डॉक्टरों कों 50 फ़ीसदी तक कमीशन देती हैं.

विजय बर्नवाल कहते हैं कि इस तरह के हालत में उन्हें अपनी कंपनी की दवा बेचने मे बेहद कठिनाई होती है,क्योंकि अधिकतर डॉक्टर उन कंपनियों की दवाओं को ही अपने मरीज़ों को लेने की सलाह देते हैं जिनमें अधिक कमीशन मिलता है.

लखनऊ के एक डॉक्टर नाम ना छापने की शर्त पर बताते हैं, "सबसे पहले तो ये समझना होगा कि कोई भी डॉक्टर अपनी ओर से ये कोशिश नहीं करता कि उसे विदेश मे आयोजित होने वाले किसी सम्मेलन मे भाग लेने के लिए कोई भी दवा बनाने वाली कंपनी प्रायोजित करे.

ये जीएसके का नीतिगत फ़ैसला हो सकता है और इससे डॉक्टरों पर फ़िलहाल कोई असर नहीं पड़ने वाला है.

क्योंकि विश्व के किसी हिस्से मे भी जब चिकित्सा से जुड़ा सम्मेलन होता है तो उसका आयोजन किसी बड़े संगठन द्वारा किया जाता है न कि किसी कंपनी की ओर से."

डॉक्टर प्रवीण मंगलूनिया पेशे से फिजीशियन हैं और जयपुर शहर के एक निजी अस्पताल के निदेशक भी.

उन्होंने बताया कि दवा बनाने वाली कंपनियाँ डॉक्टरों को उपहार देकर यक़ीनन उन्हें लुभाने और ललचाने की कोशिश करती हैं. दो रुपए वाली सस्ती दवा की जगह 20 रुपए की महँगी दवा लिख देना सहज सी बात है. इस चक्कर में ज़रुरत से ज़्यादा दवाएं रोगियों को लिख दी जाती हैं.

नई दवा आने पर पुरानी सस्ती और अच्छी दवा लिखना कम हो जाता है. कोई कॉन्फ्रेंस नाम को ही रख दी जाती है और उस बहाने से डॉक्टर पूरे परिवार के साथ विदेश सैर कर आता है. जन्मदिन पर परिवार और रिश्तेदारों के साथ महंगे और लग्ज़री होटलों में डिनर की पेशकश तो आम बात है.

मुझे नहीं लगता कि डॉक्टरों का सहज ही इसे समर्थन मिल पाएगा लेकिन ये हक़ीक़त है कि आज भी बहुत से डॉक्टर ऐसे ललचाने वाले उपहारों को स्वीकार नहीं करते हैं. इसके लिए बेहतर है कि सरकार कड़ा क़ानून बनाए और ऐसे उपहारों को रिश्वत घोषित कर दे.

जयपुर के ही एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव कहते हैं कि ये कोई नई बात नहीं है. ऐसा सालों से हो रहा है और ये बहुत कॉमन प्रैक्टिस है. मुझे तो ये कल्पना से परे की बात लगती है कि आख़िर जब कोई कंपनी कुछ नहीं देगी तो वो डॉक्टर किसी कंपनी की दवा भला क्यों लिखेंगे?

अगर कोई एक कंपनी ऐसा फ़ैसला लेती है तो उसके प्रतिनिधियों को वाक़ई में बहुत दिक़्क़त आएगी. ये देखने में आता है कि कुछ डॉक्टर उपहार नहीं लेते लेकिन फिर भी ऐसे डॉक्टर किसी न किसी तरह से प्रभावित होते ही हैं. कई तो अपने बच्चों की फीस तक भरवाते हैं.

मैं जब 20 साल पहले इस नौकरी में आया था तो डॉक्टर इतना कुछ नहीं पाते थे. अब तो वे कोई बेशक़ीमती कार खरीदते हैं तो उसकी क़िस्त दवा कंपनी भरती है. ये सब लालच छूटना मुझे तो नामुमकिन सा लगता है.

मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव ने नाम छुपाने का आग्रह किया था. इसलिए इनकी पहचान ज़ाहिर नहीं की गई है.

Source: bbc.co.uk

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