इतिहास गढ़ने वाली होगी यह यात्रा

30 November, 2013 1:50 PM

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जापान के सम्राट अकीहितो और साम्राज्ञी मिचिको ने 53 वर्ष पूर्व 1960 में जब भारत की यात्रा की थी उस समय भारत हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में चीन की लालसेना की धमकियों का सामना कर रहा था.

आधी सदी के अंतराल के बाद इतिहास मानो खुद को दोहरा रहा है. आज जापान अपने समुद्री सीमा क्षेत्र में चीन की इसी आक्रामक धौंसपट्टी का सामना कर रहा है.

पूर्वी एशिया में जारी इस अप्रत्याशित घटनाक्रम के बीच हो रही जापानी शाही दंपति की भारत यात्रा का महत्व अब गुणात्मक रूप से बदल गया है. वैसे इस बात की अपेक्षा नहीं है कि जापान के सांकेतिक प्रमुख अपनी यात्रा के दौरान भारतीय नेताओं के साथ विस्तृत रणनीतिक वार्ता करें. लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह यात्रा अब केवल रस्मी नहीं रह गई है, बल्कि इसमें एशिया-प्रशांत क्षेत्र की नई चुनौतियों पर निश्चित रूप से वार्ता होगी.

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने इस यात्रा को फलदायी बनाने पर खास जोर दिया है. प्रतीत होता है कि डॉ. सिंह अपने दूसरे कार्यकाल के अंतिम दौर में जापान के साथ संबंधों में वैसी ही छलांग लगाने के इच्छुक हैं जैसा भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु सहयोग समझौते के दौरान हुआ था.

शाही दंपति की भारत यात्रा पर सबसे सतर्क नजर चीन की होगी. चीन को इससे एतराज नहीं है कि उसके पूर्वी और पश्चिमी पड़ोसी आर्थिक संबंधों को और प्रगाढ़ करें. लेकिन अगर इन संबंधों ने कोई रणनीति या सामरिक रूप ग्रहण किया तो उसकी भृकुटि अवश्य तन जाएगी.

चीन की दक्षिणी और पूर्वी समुद्री सीमा क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से तनाव चल रहा है. जापान, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, वियतनाम आदि देश जलसीमा के बारे में चीन के दावे को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. अमेरिका और अग्रणी अर्थव्यवस्था वाले देशों की चिंता इस क्षेत्र से हो रहे व्यापार के नौवहन की सुरक्षा है. यह व्यापार कुल विश्व व्यापार का 40 प्रतिशत है.

जापान की राजनीति में राष्ट्रवादी तेवर रखने वाले शिंजो एबे के गत वर्ष सत्ता में आने के बाद से ही पूर्व एशिया में माहौल गर्म होने लगा है. शिंजो की लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने अपने देश के साम्राज्यवादी इतिहास और सीमा दावों के बारे में उग्र नीति अपना रखी है. वर्तमान विवाद तब शुरू हुआ जब जापान सरकार ने पूर्वी चीन सागर में स्थित कुछ निर्जन द्वीपों और चट्टानी भूखंडों को अपने सीधे नियंतण्रमें लेने का फैसला किया. पहले यह द्वीप निजी स्वामित्व में थे. सबसे अधिक विवाद सेनकाकू द्वीप को लेकर है जिसे चीन डियाओबू द्वीप कहकर पुकारता है तथा इसे ऐतिहासिक आधार पर अपना हिस्सा मानता है.

चीन ने इस द्वीप के इर्दगिर्द ‘वायु सुरक्षा पहचान क्षेत्र’ घोषित करते हुए ऐलान किया है कि इस क्षेत्र के ऊपर से गुजरने वाले विमान चीनी अधिकारियों को अपने यात्रा मार्ग के बारे में सूचना दें तथा अपनी पहचान बताएं. जाहिर है कि कोई अन्य देश यदि इस एकतरफा निर्देश का पालन करता है तो यह उस क्षेत्र पर चीन की संप्रभुता मानने जैसा होगा. चीन की धौंसपट्टी का उत्तर देने के लिए पहले अमेरिका ने अपने बी-52 बमवषर्कों को बिना सूचना दिए इस वायुक्षेत्र से गुजारा.

बाद में जापान और दक्षिण कोरिया के टोही विमानों ने भी ऐसा ही किया. इस पर चीन ने बहुत तल्ख टिप्पणी की है. फिलहाल सैन्य कार्रवाई का खतरा तो नहीं है लेकिन राजनयिक कटुता बढ़ने के साथ ही पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में स्थायित्व अलबत्ता प्रभावित हो सकता है. आर्थिक मंदी के दौर में महाशक्तियों का शक्ति प्रदर्शन किसी भी दृष्टि से सहायक नहीं है.

भारत अपने आर्थिक विकास के लिए जापान के आर्थिक संसाधनों और प्रौद्योगिकी का भरपूर इस्तेमाल करने का इच्छुक है. पिछले कुछ वर्षों के दौरान आधारभूत ढांचे के विकास के मेगा प्रोजेक्टों में जापान ने आर्थिक सहयोग देने की घोषणा की है. इनमें दिल्ली-मुंबई रेल माल गलियारे और औद्योगिक गलियारे की स्थापना की महत्वाकांक्षी परियोजनाएं शामिल है. बेंगलुरू के मेट्रो रेल प्रोजेक्ट में भी जापानी सहयोग अपेक्षित है. साथ ही जापान भारत की प्रशिक्षित मानवशक्ति का उपयोग अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए करने का इच्छुक है. जापान भारत को आर्थिक सहायता देने वाला प्रमुख देश है तथा भारत में प्रमुख निवेशक भी.

आर्थिक सहयोग की एवज में जापान भारत से क्या चाहता है और क्या भारत जापान की मांग को पूरा करने के लिए तैयार है? ये दोनों सवाल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए यक्षप्रश्न बन गए हैं. प्रधानमंत्री एबे तो एशिया-प्रशांत क्षेत्र का जो सुरक्षा ढांचा बनाना चाहते हैं वह चीन के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है. प्रधानमंत्री एबे ने अपने विवादास्पद विदेशनीति संबंधी संबोधन में कहा था कि प्रशांत महासागर और हिंद महासागर की सुरक्षा और शांति एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई है.

एक क्षेत्र में जो होगा उसका असर दूसरे क्षेत्र पर पड़ेगा. उन्होंने आशंका व्यक्त की कि पूर्वी चीन सागर में चीन की सैन्य-असैन्य गतिविधियों से जाहिर है कि वह इस समुद्री क्षेत्र को अपनी मिल्कियत मान रहा है. फिलहाल चीन ने इस क्षेत्र में अपने छोटे जलयान भेजे हैं लेकिन वह दिन दूर नहीं जब वहां चीन परमाणु मिसाइलों से लैस पनडुब्बियां और विध्वंशक पोत तैनात कर देगा.

जापानी प्रधानमंत्री ने भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका को मिलाकर एक ‘लोकतांत्रिक सुरक्षा तंत्र’ स्थापित करने की वकालत की. कुछ दिन पहले ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने भी ऐसे ही सुरक्षा गठबंधन का सुझाव रखा था. चीन की ओर से इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई थी. उसने आरोप लगाया था कि अमेरिका अपने मित्र देशों के साथ मिलकर उसकी सैन्य घेरेबंदी कर रहा है. चीन ने भारत को भी आगाह किया था कि वह इस साजिशी खेल में शामिल न हो.

गत मई महीने में जब जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में चीन की सैनिक टुकड़ियों ने घुसपैठ की थी उस समय प्रधानमंत्री डॉ. सिंह की जापान यात्रा के दौरान भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने बहुत उग्र तेवर दिखाए थे. ‘पीपुल्स डेली’ ने जापान के नेताओं को छिछोरा और साजिशी शख्सियत तक करार दिया था. अखबार का आरोप था कि जापानी नेता भारत को अपने जाल में फंसा कर उसे चीन के खिलाफ मोहरा बनाने की कोशिश कर रहे हैं. चीन का कहना था कि भारत स्वतंत्र विदेशनीति पर अमल करता है तथा वह ऐसे किसी खेल में शामिल नहीं होना चाहेगा.

वास्तविकता भी यही है कि भारत एशिया-प्रशांत में हो रहे घटनाक्रम में स्वयं एक पक्ष नहीं बनना चाहता. वह सभी देशों के साथ अपनी शर्तो पर आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा संबंध कायम करने का इच्छुक है. एक ओर वह जापान और अमेरिका के साथ त्रिपक्षीय वार्ताओं के जरिए पूर्व एशिया के घटनाक्रम पर बारीक नजर रखे हुए है, तो दूसरी ओर वह चीन और रूस के साथ त्रिगुट मंच में भी शामिल है. भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बनने वाले किसी सैन्य गठबंधन के साथ स्वयं को नहीं जोड़ना चाहेगा.

उसका जोर इस बात पर है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नियमों के अनुरूप समुद्री नौवहन को सुरक्षित बनाए रखा जाना चाहिए. रणनीतिक दृष्टि से भारत ने चीन के नेतृत्व को भी संकेत दे दिया है कि आगामी दशकों की विश्व राजनीति में वह किसी देश का वर्चस्व स्वीकार नहीं करेगा. वह बहुध्रुवीय विश्व का उभार देखना चाहता है जिसमें सभी देश स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करें.

जापान के सम्राट बहुत कम विदेश यात्राएं करते हैं. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार कहते हैं कि जापान जब अपनी विदेश नीति में कोई बड़ा फेरबदल करता है, तब शाही भ्रमण को एक संकेत के रूप में पेश किया जाता है. सम्राट अकीहितो की भारत यात्रा भी एक ऐसा ही अवसर है. देखना यह है कि भारत इस यात्रा से किस सीमा तक अपने आर्थिक और राजनयिक हितों की पूर्ति कर पाता है. यह यात्रा चीन को एक संदेश अवश्य देगी, लेकिन भारत यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि पड़ोसी देश अनावश्यक रूप से भयाक्रांत न हो.

Source: samaylive.com

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