क्या 'ग्रेट' साबित होंगे 'सिंह साहब'?

23 November, 2013 2:03 AM

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क्या 'ग्रेट' साबित होंगे 'सिंह साहब'?

'सिंह साहब द ग्रेट' कहानी है एक सिद्धांतवादी व्यक्ति की भ्रष्टाचार से लड़ाई की. सरनजीत तलवार (सनी देओल) एक शहर में कलेक्टर हैं, जहां भूदेव (प्रकाश राज) का राज चलता है. उसका कहा वहां पत्थर की लकीर माना जाता है.

सरनजीत को अपनी तरफ़ मिलाने के लिए भूदेव उसे रिश्वत देने की कोशिश करता है. लेकिन सरनजीत सिद्धांतवादी होने के नाते रिश्वत से साफ़ इनकार कर देता है और भूदेव के सारे अवैध धंधे बंद करवा देता है.

भूदेव सरनजीत को सबक सिखाने के लिए उसके परिवार के पीछे पड़ जाता है और साज़िश के तहत उसकी पत्नी मिनी (उर्वशी रौतेला) को ज़हर देकर मरवा डालता है. फिर वो सरनजीत को झूठे आरोप में फंसाकर जेल भिजवा देता है.

जेल से छूटने के बाद सरनजीत भूदेव से बदला लेने के बजाय समाज सुधार के काम में और लोगों की मदद में लग जाता है. उसके अच्छे कामों से प्रभावित होकर लोग उसे सिंह साहब कहने लगते हैं.

फिर वह वापस भूदेव के शहर में आता है और उसे अच्छा इंसान बनाने की कोशिश करता है, लेकिन भूदेव और चिढ़ जाता है वो सरनजीत की बहन और भांजे का अपहरण कर लेता है.

सरनजीत के पास कोई और चारा नहीं बचता, तो वह भी बदले में भूदेव की पत्नी और बेटी का अपहरण कर लेता है.

आगे क्या होता है. यही फ़िल्म की कहानी है. फ़िल्म में कुछ भी नयापन नहीं है. भ्रष्टाचार बहुत पुरानी सामाजिक बुराई है और फ़िल्म में उससे निपटने का कोई नया तरीका नहीं दिखाया गया है.

बदले के बजाय बदलाव की बात, कहानी में नई ज़रूर है लेकिन फ़िल्म के बीच में यह बदलाव वाला एंगल भी कहीं ग़ायब हो जाता है. जिससे फ़िल्म एक आम रिवेंज ड्रामा बनकर रह जाती है.

स्क्रीनप्ले लेखक शक्तिमान ने 'सिंघम' जैसी फ़िल्म का बेहद दिलचस्प स्क्रीनप्ले लिखा था, लेकिन 'सिंह साहब द ग्रेट', 'सिंघम' के आसपास भी नहीं पहुंच पाई है.

इंटरवल से पहले फ़िल्म बहुत धीमी रफ़्तार से बढ़ती है और दर्शकों को बोर कर देती है. इस हिस्से में सनी देओल के लुक्स और कपड़ों पर भी ध्यान नहीं दिया गया है.

इंटरवल के बाद फ़िल्म में रफ़्तार आती है..हालांकि इस हिस्से में भी कोई नवीनता नहीं है लेकिन सनी देओल और प्रकाश राज के बीच कुछ सीन अच्छे बन पड़े हैं जो दर्शकों को पसंद आएंगे.

फ़िल्म के एक बड़े हिस्से में सनी देओल और प्रकाश राज की चिल्ला-चिल्लाकर बोलने वाली संवाद अदायगी से कई दर्शकों को खीझ भी हो सकती है.

फ़िल्म की कहानी को भावनात्मक बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन परदे पर वो भावनाएं नज़र नहीं आतीं.

सनी देओल ने एक्शन दृश्यों में जान डाल दी है और बाकी के दृश्यों में भी वह जमे हैं, लेकिन अब उन्हें उम्र के इस पड़ाव पर अपने लुक्स और कपड़ों पर ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है.

नवोदित उर्वशी रौतेला अच्छी लगी भी हैं और उन्होंने अच्छा काम भी किया है. प्रकाश राज खलनायक के रोल में जमे हैं. वह कई दृश्यों में बहुत असरदार लगे हैं.

निर्देशक अनिल शर्मा ने एक ख़ास दर्शक विशेष को ध्यान में रखकर फ़िल्म बनाई है. उनका निर्देशन ठीक है लेकिन फ़िल्म के लिए विषय का चुनाव ठीक नहीं है.

फ़िल्म का संगीत भी साधारण है. फ़िल्म के एक्शन दृश्य अच्छे हैं और दर्शकों को पसंद आएंगे.

कुल-मिलाकर 'सिंह साहब द ग्रेट' एक आम रिवेंज ड्रामा है. इसके सिंगल स्क्रीन थिएटर्स में चलने की ज़्यादा संभावना है. मल्टीप्लेक्सेज़ में फ़िल्म का कारोबार मंदा ही रहेगा.

Source: bbc.co.uk

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