नसीरूद्दीन ने की अपने पिता की कब्र से गुफ्तगू

15 September, 2014 7:13 AM

37 0

मुंबई (एसएनएन): बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को अपने पिता आले मोहम्मद शाह के साथ अनसुलझे रिश्ते आज भी तंग करते हैं. शाह ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि किस तरह उनके पिता के साथ उनका वास्तविक संवाद उनकी कब्र पर जाकर हुआ. एक दूसरे के प्रति लगाव होने के बावजूद पिता-पुत्र के रिश्तों में असहजता नसीरुद्दीन के संस्मरण ‘ऐंड दैन वन डे’ में दिखाई पड़ती है.

मुंबई (एसएनएन): बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को अपने पिता आले मोहम्मद शाह के साथ अनसुलझे रिश्ते आज भी तंग करते हैं. शाह ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि किस तरह उनके पिता के साथ उनका वास्तविक संवाद उनकी कब्र पर जाकर हुआ. एक दूसरे के प्रति लगाव होने के बावजूद पिता-पुत्र के रिश्तों में असहजता नसीरुद्दीन के संस्मरण ‘ऐंड दैन वन डे’ में दिखाई पड़ती है.

शाह की आत्मकथा में उनके जीवन के शुरुआती 40 साल और अभिनेता के तौर पर जगह बनाने के लिए उनके संघर्ष की कहानी बयान की गई है. उनका अभिनेता बनने का सपना उनके पिता को मंजूर नहीं था. शाह ने अपनी आत्मकथा में उस दिन को भी याद किया है जब वह अपने पिता के अंतिम क्षणों में उनके पास नहीं पहुंच सके क्योंकि वह विमानकर्मियों को प्लेन नीचे उतारने की उनकी जरुरत के बारे में समझाने में नाकाम रहे.

शाह की आत्मकथा में उनके जीवन के शुरुआती 40 साल और अभिनेता के तौर पर जगह बनाने के लिए उनके संघर्ष की कहानी बयान की गई है. उनका अभिनेता बनने का सपना उनके पिता को मंजूर नहीं था. शाह ने अपनी आत्मकथा में उस दिन को भी याद किया है जब वह अपने पिता के अंतिम क्षणों में उनके पास नहीं पहुंच सके क्योंकि वह विमानकर्मियों को प्लेन नीचे उतारने की उनकी जरुरत के बारे में समझाने में नाकाम रहे.

शाह लिखते हैं कि ‘‘जिस दिन मैं सरधना पहुंचा, मैं जमीन के उस हिस्से के पास गया जहां अब बाबा थे. उस दिन मैंने उनसे उस फिल्म के बारे में बात की जिसे मैंने तभी पूरा किया था. फिल्म में बिना दाढ़ी वाले एक हिंदू पुजारी के मेरे किरदार पर उनके आनंद को मैंने महसूस किया. मैंने उन्हें मेरे सपनों और मेरे संदेहों के बारे में बताया और रत्‍ना के बारे में बताया जिससे वह कभी नहीं मिले थे. मैंने उन्हें बताया कि मैं अब कितना कमा रहा हूं. मुझे पता था कि वह सुन रहे थे और जवाब दे रहे थे. यह वास्तविक संवाद था जिसकी मैंने पहल की थी. मैंने अचानक मेरे उस नुकसान को महसूस करना शुरु कर दिया जिसकी भरपाई कभी नहीं होगी और मुझे हैरानी हुई कि अचानक से मुझे उनकी कमी कितनी खलने लगी है."

शाह लिखते हैं कि ‘‘जिस दिन मैं सरधना पहुंचा, मैं जमीन के उस हिस्से के पास गया जहां अब बाबा थे. उस दिन मैंने उनसे उस फिल्म के बारे में बात की जिसे मैंने तभी पूरा किया था. फिल्म में बिना दाढ़ी वाले एक हिंदू पुजारी के मेरे किरदार पर उनके आनंद को मैंने महसूस किया. मैंने उन्हें मेरे सपनों और मेरे संदेहों के बारे में बताया और रत्‍ना के बारे में बताया जिससे वह कभी नहीं मिले थे. मैंने उन्हें बताया कि मैं अब कितना कमा रहा हूं. मुझे पता था कि वह सुन रहे थे और जवाब दे रहे थे. यह वास्तविक संवाद था जिसकी मैंने पहल की थी. मैंने अचानक मेरे उस नुकसान को महसूस करना शुरु कर दिया जिसकी भरपाई कभी नहीं होगी और मुझे हैरानी हुई कि अचानक से मुझे उनकी कमी कितनी खलने लगी है."

Source: shrinews.com

To category page

Loading...