नेपाल: माओवादी दुखी हिंदुत्ववादी खुश

3 December, 2013 1:44 AM

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नेपाल: माओवादी दुखी हिंदुत्ववादी खुश

नेपाल में चुनाव बहिष्कार के शोर-शराबे के बीच 19 नवंबर को जब दूसरी बार संविधान सभा के लिए चुनाव संपन्न हुए तो उस समय तक किसी को ये उम्मीद नहीं थी कि सब कुछ सुचारु रूप से हो जाएगा.

लेकिन चुनाव सुचारु ढंग से संपन्न हुए. लोगों का आकलन गलत निकला. किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि साल 2008 में प्रत्यक्ष मतदान में 240 में से 120 सीटें पाकर सबसे बड़ी पार्टी का स्थान पाने वाली 'एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी' इस बार केवल 26 सीटें जीतकर तीसरे स्थान पर आ जाएगी.

इस चुनाव ने माओवादियों को तो निराश किया ही, उनके विरोधियों को भी एक हद तक निराश किया जिन्हें यह उम्मीद थी कि माओवादियों को कम से कम 80 सीटें तो मिलेंगी ही. चुनाव के बाद से ही विभिन्न खेमों में माओवादियों की इस शर्मनाक हार का विश्लेषण होने लगा.

आज उन्हीं लोगों के अंदर सबसे ज्यादा खुशी है जिन्होंने किसी समय माओवादियों को तन, मन, धन से सहयोग किया था. अंतिम नतीजे आते आते अब उनकी यह खुशी चिंता में बदलने लगी है. इसकी वजह यह है कि साल 2008 में जहां राजतंत्र समर्थक पार्टी राप्रपा-नेपाल (राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी नेपाल) को समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अंतर्गत महज एक लाख के आसपास वोट मिले थे.

वहीं इस बार इसे लगभग सवा छह लाख वोट मिले हैं. यह पार्टी राजतंत्र और हिंदू राष्ट्र की हिमायती है. आज सबसे ज्यादा मनोबल इन्हीं का बढ़ा है. नेपाल में अभी जो अनिश्चय की स्थिति एक बार फिर पैदा हुई है उससे किरण की पार्टी के लोग भी दुखी हैं जो खुद इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं और प्रचंड के रास्ते को क्रांति विरोधी मानते रहे हैं.

कुछ ने इसे जनता की आकांक्षाओं पर माओवादियों का खरा न उतरना बताया तो कुछ ने इसके लिए उनकी जीवन शैली में आए बदलाव को और आम जनता से उनकी बढ़ रही दूरी को इसका कारण बताया. कुछ ने पार्टी विभाजन को कारण बताते हुए इस हार के लिए नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के अध्यक्ष मोहन बैद्य (किरण) और उनके सहयोगियों को जिम्मेदार ठहराया.

जहां तक प्रचंड और उनकी पार्टी के लोगों की बात है, उन्होंने अभी एक चौथाई मतों की गिनती पूरी भी नहीं हुई थी कि उसी समय से मतदान समाप्त होने से लेकर मतगणना शुरू होने के बीच की अवधि में हुई धांधली की एक तस्वीर पेश की और साथ ही इन चुनावों के बहिष्कार की घोषणा भी की.

इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्रत्यक्ष और समानुपातिक प्रणाली के अंतर्गत हुए मतदानों की गिनती पूरी हो चुकी है और अंतिम तौर पर नेपाली कांग्रेस को 196, नेकपा एमाले को 175 और 'एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी' को 80 सीटें मिली हैं.

प्रचंड ने संविधान सभा में भाग लेने की बात कही है बशर्ते चुनाव आयोग उनकी शिकायतों की छानबीन करे. किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है हालांकि नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित हुई है.

पिछली संविधान सभा में माओवादियों को 601 सीटों वाली संविधान सभा में 229 सीटें प्राप्त थीं लेकिन वे संविधान नहीं बना सके तो 196 सीटें पाकर नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व में संविधान निर्माण का कार्य संपन्न हो सकेगा इसमें सबको संदेह है.

नेपाल में 10 वर्षों तक चले सशस्त्र संघर्ष और 19 दिनों तक चले जनआंदोलन के बाद साल 2006 में माओवादियों और गिरिजा प्रसाद कोइराला के नेतृत्व वाली सरकार के बीच हुए समझौते के बाद तेज घटनाक्रमों की परिणति 240 साल पुराने राजतंत्र की समाप्ति और गणराज्य की स्थापना के रूप में हुई.

इसका शत प्रतिशत श्रेय माओवादियों को मिला क्योंकि अन्य पार्टियां किसी न किसी रूप में राजतंत्र को बनाए रखना चाहती थीं. भारत सरकार भी अपने 'ट्विन पिलर' सिद्धांत के अनुसार नेपाल की स्थिरता के लिए संवैधानिक राजतंत्र और लोकतंत्र को अनिवार्य मानती थी. अमरीका की भी यही स्थिति थी.

माओवादियों ने राजतंत्र के पक्ष में निर्मित इस लगभग अभेद्य दुर्ग को ध्वस्त कर दिया और जनता की अभूतपूर्व प्रशंसा पाई. माओवादियों का यह स्वर्णिमकाल था जब उन्होंने भारत, अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देशों और देशी प्रतिक्रियावादी तत्वों के सहारे टिके राजतंत्र को धूल चटा दिया.

साल 2008 के चुनाव में जनता ने इनको जबर्दस्त समर्थन दिया और दक्षिण एशिया में पहली बार किसी ऐसी पार्टी की सरकार बनी जो खुद को घोषित तौर पर माओवादी कम्युनिस्ट कहती थी, जिसकी अपनी निजी जनमुक्ति सेना थी और जो सशस्त्र संघर्ष के बाद चुनाव के जरिए सत्ता में आई.

माओवादियों की आंखों पर इस सफलता की धुंध इतनी गाढ़ी होती गई कि वे भविष्य की आपदा को देख नहीं पाए. उन्हें राजतंत्र को हटाने का गुरूर ऐसा चढ़ा कि वे लोगों से दूर होते गए और देखते-देखते वही लोग जिन्होंने 2006 में उन्हें ऐतिहासिक जीत दिलाई थी, वे छिटटकर दूर हो गए. उस न पाट सकने वाली दूरी का अंदाजा शायद अब माओवादियों को ताजा चुनावी परिणाम से हो रहा हो.

उन्हें भी लग रहा है कि प्रतिगामी और यथास्थितिवादी ताकतों को माओवादियों के नाकारापन की वजह से मजबूती मिली है. उनके लिए यह आत्म मंथन और आत्मालोचना का समय है.

नेपाली कांग्रेस के नेता सुशील कोइराला सभी दलों को, यहां तक कि चुनाव बहिष्कार करने वाली नेकपा-माओवादी को भी साथ लेकर सरकार बनाने की बात कर रहे हैं ताकि संविधान निर्माण का काम इस बार संपन्न हो जाए. संविधान निर्माण को लेकर सबके मन में संदेह बना हुआ है और माओवादियों की पक्की धारणा है कि अगर संविधान किसी तरह बन भी गया तो उनका एजेंडा अब काफी पीछे छूट गया है.

Source: bbc.co.uk

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