फिल्म रिव्यू: कन्फ्यूजन के कोने में फंसी कहानी 'सोनाली केबल' की

17 October, 2014 7:37 AM

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फिल्म रिव्यू: कन्फ्यूजन के कोने में फंसी कहानी 'सोनाली केबल' की

एक पटाखा गुड्डी. नाम सोनाली तांडेल. मुंबई की बस्तियों में अपना इंटरनेट केबल का कारोबार करती है. उत्साही युवाओं के साथ. उसकी स्लीपिंग पार्टनर हैं लोकल नेता मीना ताई. सब कुछ सटाक चल रहा है. मगर तभी आ जाता है एक कॉरपोरेट बिग बनिया. नाम है वाघेला. खाखड़ा खाते खाते सारे लोकल धंधे खा लेना चाहता है. और अब उसके रास्ते का आखिरी कांटा है सोनाली केबल. सोनाली भी सीना तान खड़ी हो जाती है. साथ में उसके पंटर भी. और अब तो उसकी मदद के लिए मीना ताई का बेटा. बचपन का यार रघु भी आ गया है अमरीका से पढ़कर.

मगर जब सब कुछ सेट दिखता है, तभी नए पुराने घाव खुलने लगते हैं. सोनाली की मां किसके साथ भाग गई. बाप इतना दारू क्यों पीता है. मीना ताई के साथ रहने वाला मामा क्या घुसपुस करता रहता है. रघु की मां के बिजनेस पार्टनर की हॉट बेब बेटी रघु से इतना क्यों चिपकती है. रघु और सोनाली के बीच प्यार कैसे पकता है. सोनाली के मुंहबोले बेटे और कर्मचारी सदा की अपने गुंडा भाई से इतनी लगती क्यों है. और वाघेला का दब्बू मैनेजर बॉबी घोष अंदर ही अंदर क्या खिचड़ी पका रहा है.

आखिर में एफडीआई से आक्रामक दिखते देसी कॉरपोरेट हाउस की हार होती है. रिटेल दुकानदार जीतता है. और मेक इन इंडिया का देसी नारा बुलंद होता है. फिल्म की नीयत अच्छी है, मगर कहानी कुछ सुस्त और कन्फ्यूज लगती है. फिल्म के डायरेक्टर चारुदत्त आचार्य ने ही इसे लिखा है. एक मोड़ पर आकर असल प्लॉट में इतनी चीजें आकर मिल जाती हैं. कि घालमेल अवश्यंभावी हो जाता है और इससे रंगोली नहीं घिच घिच डिजाइन बनती है.

सोनाली के लीड रोल में रिया चक्रवर्ती लाउड लगती हैं. वह क्यूट हैं. सतह के नीचे सेक्सी हैं. पर सबसे जरूरी चीज है एक्टिंग. चेहरे और हाव भाव के उतार चढ़ाव. और एक ही बैंड विड्थ पर सभी संवाद न बोलना. यहां रिया कमजोर पड़ जाती हैं. रघु के रोल में अली फजल अच्छे लगे हैं. बल्कि मुझे तो वो अभी तक के सभी रोल में जमे हैं. चाहे वह थ्री ईडियट्स का छोटा सा रोल हो या बॉबी जासूस में विद्या बालन के साथ का रोल. फुकरे भी बढ़िया फिल्म थी उनकी. और अब समय आ गया है कि रघु कुछ अच्छे बैनर्स और निर्देशकों के साथ काम करें. इस फिल्म में सदा के रोल में नजर आए हैं कमाल के कोरियाग्राफर यंग बालक राघव जुयाल. उन्होंने डांस ही नहीं एक्टिंग में भी संभावना जताई है.

अनुपम खेर चलन के उलट वाघेला के रोल में बोर करते हैं. निर्देशक ने उनके किरदार के मैनरिज्म पर जरूरत से ज्यादा ही फोकस कर दिया. फिल्म का सरप्राइज पैकेज हैं प्रतिष्ठित गीतकार और संगीतकार स्वानंद किरकिरे. सोनाली के पियक्कड़ बाप के रोल को उन्होंने सुर्ख रंग अता किए हैं.

फिल्म का संगीत औसत है. कुछ जबरन ठेले गए गाने फिल्म की कहानी को सुस्त करते हैं. डायरेक्शन पहली बार को देखते हुए तो ठीक है. मगर बॉक्स ऑफिस सभी को एक ही तरह से ट्रीट करता है. इसलिए इस मोर्चे पर चुस्ती की दरकार होगी आगे.

फिल्म 'सोनाली केबल' एक नई थीम पर बनाई गई प्रयोगशील फिल्म है. लेंथ बहुत ज्यादा नहीं है. इसका लीड पेयर क्यूट लगता है. पर कहानी एवरेज है. मन बहुत मचले तो इस फिल्म को देखने जा सकते हैं.

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Source: aajtak.intoday.in

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