फिल्म रिव्यूः पढ़ें कैसी है फिल्म हवा हवाई

8 May, 2014 7:04 AM

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फिल्म रिव्यूः पढ़ें कैसी है फिल्म हवा हवाई

फिल्म हवा हवाई का मीडिया प्रिव्यू देख रहा था. इंटरवल में बाहर आया तो देखा, अमोल भी लॉबी में मौजूद थे. तमाम बातचीत के बीच उन्हें एक दर्शक की हैसियत से शुक्रिया अदा किया. तारे जमीं पर, स्टेनल का डब्बा और अब हवा हवाई. आखिर मायानगरी में कोई तो है, जो बच्चों की फिल्में बनाता है, मगर बचकानी फिल्में नहीं बनाता.

अमोल बोले, दिक्कत बच्चों की समझ की नहीं, उन बड़ों की है, जो बच्चों को कम समझदार सोच हल्की फिल्में बनाते हैं. अमोल ये बोल रहे थे और मेरे मन में हवा हवाई का ही गाना, तू कर मत डर, अंगारों पर चलना है सही, गूंज रहा था. बॉक्स ऑफिस के दबाव के नाम पर कुछ भी बना देने वाले निर्देशकों की जमात के सामने वही करना जो सही है, सतही नहीं है, वाकई साहस का काम है. तो सबसे पहले तो एक और शानदार, संवेदनशील फिल्म बनाने के लिए सलाम अमोल गुप्ते.

हवा हवाई कहानी है महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के एक किसान के बेटे की. किसान की अचानक मौत हो जाती है तो उसकी पत्नी मजबूरन महानगर मुंबई की एक चाल में बच्चों और आई समेत बसर करने आ जाती है. बेटा अर्जुन मां का हाथ बंटाने के लिए एक चायवाले के यहां काम करने लगता है. यहीं एक रात उसके परों को एक आसमान मिलता है. जब वह पार्किंग लॉट में स्केटिंग करते बच्चों को और उनके कोच को देखता है.

काम पर आते जाते अर्जुन की उन बच्चों से दोस्ती हो जाती है, जो हमें हर रोज सड़क पर हमारी मध्यवर्गीय चमक को आइना दिखाते नजर आते हैं. कोई गजरा बेचता है, तो कोई ऑटो वर्कशॉप में नौकरी करता है. कोई कचरा बीनता है, तो कोई कारीगर के साथ बैठा आंखें छील तुरपाई करता रहता है.

जब अर्जुन इन दोस्तों के साथ अपनी पहियों वाली चमक साझा करता है, तो इनकी भी आंखें रौशन हो जाती हैं. जब जुट जाते हैं और फिर कचरे से बनता है एक स्केटिंग शूज का सजीला पेयर, जिसका नाम रखा जाता है हवा हवाई. अर्जुन अपनी मेहनत के दम पर स्केटिंग कोच का पहले एकलव्य और फिर अर्जुन बन जाता है. कोच भी इस लड़के की लगन देख अपनी लाइफ के बाकी प्लान मुल्तवी कर इस चक्के को रफ्तार देने लगता है.

फिल्म में अर्जुन का रोल निभाया है पार्थो गुप्ते ने, जो अमोल के बेटे हैं. इससे पहले हम उन्हें तारे जमीन पर और स्टेनले का डब्बा में भी देख चुके हैं. अमूमन चाइल्ड आर्टिस्ट के साथ यह डर लगा रहता है कि कहीं बड़े होने के क्रम में वे अपना हुनर न खो दें. पार्थो को देखकर ये यकीन हो रहा है कि हर बीतते बरस के साथ उनकी उमंग जवां हो रही है. इस लड़के की एक्टिंग देखकर आंखें भर आती हैं. अपनी मां के सामने बड़प्पन दिखाता, दोस्तों के सामने बराबरी की जमीन पर आ जाता, गुरु के सामने सब कुछ सीखने का संकल्प जीम बैठ जाता पार्थो सिनेमाघर में नहीं छूटता. हमारे भीतर उजास की तरह साथ आता है. एक एक्टर के लिए इससे बड़ी कामयाबी और क्या हो सकती है.

स्केटिंग कोच के रोल में साकिब हसन हैं. उन्हें इससे पहले हमने मेरे डैड की मारुती में देखा था. बतौर एक्टर वह कुछ बेहतर हुए हैं, लेकिन अभी काफी गुंजाइश बाकी है.

फिल्म के बाकी चाइल्ड आर्टिस्ट और दूसरे एक्टर्स ने कमाल का काम किया है. मसलन, अर्जुन की मां की भूमिका में नेहा जोशी. इस किरदार के हिस्से ज्यादा संवाद नहीं आए हैं, मगर कैमरा जब भी उनकी आंखों पर ठहरता है. मायूसी, मुस्कान और ममता को नए शब्द मिल जाते हैं.

फिल्म का म्यूजिक भी सरसराती हवा की तरह साथ चलता है, कहीं भी रफ्तार में बाधा खड़ी नहीं करता.

अमोल गुप्ते ने बतौर कहानीकार और डायरेक्टर एक बार फिर कल्पना की नई उड़ान भरी है. अर्जुन की कहानी कहने के क्रम में उन्होंने समाज की कई परतें जो दबी छिपी रहती हैं, या जिन्हें देखने से हम बचते हैं, ऐन हमारी आंखों के सामने बोल्ड रंगों में उतार कर रख दी हैं. अब विकल्प दो हैं. या तो अंधे होने का ढोंग किया जाए या इस सच को कुबूल कर बदलने की कोशिश की जाए. फिल्म का हर शख्स यही कोशिश करता नजर आता है.

कहानी के जरिए सिर्फ खेल या सपने के जुनून को ही नहीं दिखाया गया है. बल्कि इंसानियत के, दोस्ती के और भरोसे के कई पाठ भी बिना प्रवचन की कर्कशता अपनाए क्रमशः पढ़ाए गए हैं.

ये फिल्म बच्चों को तो देखनी ही चाहिए. बड़ों को भी जरूर जाना चाहिए. गर्मियों की छुट्टी की मस्ट वॉच फिल्म.

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Source: aajtak.intoday.in

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