फिल्म रिव्यूः ‘परांठे वाली गली’ में खरापन कम है

17 January, 2014 3:08 PM

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फिल्म रिव्यूः ‘परांठे वाली गली’ में खरापन कम है

एक नौजवान है, उसका नाम मौलिक है. मौलिक अलवर का रहने वाला है और दिल्ली में थिएटर करता है. उसकी यारों की टोली है, विवियन, दानिश जैसे नौजवान, जिनका अलग अलग मिजाज है और नाटक के लिए जुनून उन्हें एक साथ जोड़ता है. इनकी एक छोटी सी दुनिया है जो पुरानी दिल्ली की एक धर्मशाला में बसती है. इस दुनिया में एक झगड़े के चलते आती है तीखी नैना कौर. नैना का बस एक ही सपना है. उसके 'किसिम किसिम' के परांठे पूरी दिल्ली खाए और पेमेंट टाइम पर देती जाए. परांठों का नाटक से जब मेल आता है, तो एक लकीर पर डगर मगर चलती स्टोरी में कुछ बल आते हैं. जाहिर तौर पर मौलिक और नैना के बीच प्यार होता है. मगर जब ये पूरा समूह एक बड़ा नाटक करने जा रहा होता है, किस्मत नौटंकी ठेल देती है और रायता फैल जाता है.

ये तो था कहानी का कंकाल. अब बताते हैं कुछ अस्थि मज्जा के बारे में. फिल्म परांठे वाली गली शायद नाट्य शास्त्र के उस दर्शन से प्रभावित है, जिसमें कला को रस पाने का जरिया माना गया है. यहां पर थिएटर की दुनिया है. उसकी दुश्वारियां हैं. और इनसे लड़ने का हौसला देते परांठे हैं. गोया वे परांठे न होकर इस फरेब भरी दुनिया में इकलौती ऐसी चीज हों, जो तमाम मसालों के बावजूद अपने खरेपन के चलते हमारी आस्था को सहारा देती है. इस प्रतीकों से कुछ आगे बढ़ें तो मां-बेटी का रिश्ता है, जिसमें यकीकन मां, जो प्रकटतः बुजुर्ग है, फेसबुक इरा की कूल दादी के अवतार में नजर आती हैं. बेटी कभी नीम-नीम, कभी शहद-शहद है और जब किकयाती है, तो लगता है कि सिनेमा हॉल के साउंड में कोई दिक्कत है क्या. मौलिक और नैना का आपसी खिंचाव भी है, जिसकी जमीन पर प्रेम का अंखुआ फूटता है, मगर ये उतना स्वाभाविक नहीं. दोस्त हैं, जो इतने असहज ढंग से मजाक करते हैं, गोया किसी की लिखी लाइन पढ़ रहे हों. कुल जमा ये कि इस फिल्म में नाटक का एलिमेंट बहुत हावी है. और इस फेर में चीजें कभी बेइंतहां सुस्त, तो कभी औचक लाउड होकर सामने आती हैं.

फिल्म में लीड रोल में हैं अनुज सक्सेना और नेहा पवार. अनुज के रोल में बहुत गुंजाइश थी, मगर कसर रह गई. यही बात कुछ घटा-बढ़ाकर नेहा के लिए भी कही जा सकती है. फिल्म का संगीत भी औसत ही है. लोकेशन के नाम पर जरूर कैमरा पुरानी दिल्ली की गलियों में खूब घूमा है. निर्देशक सचिन गुप्ता का थियेटर बैकग्राउंड फिल्ममेकिंग पर हावी रहा.

फिल्म परांठे वाली गली देख सकते हैं, अगर थिएटर के लिए जूझते लोगों की जिंदगी की कुछ परतें समझनी हैं. वैकल्पिक सिनेमा में दिलचस्पी है और तेल में तले परांठों के मुरीद हैं.

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Source: aajtak.intoday.in

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