फिल्‍म रिव्‍यू: बिजली की कालिख की कहानी है कटियाबाज

22 August, 2014 2:25 PM

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फिल्‍म रिव्‍यू: बिजली की कालिख की कहानी है कटियाबाज

सबसे पहले तो आप ये समझ लें कि कटियाबाज तकनीकी तौर पर तो डॉक्युमेंट्री है, मगर असल में ये एक फिल्म है. फिल्म से भी ज्यादा ये एक रियल का रिएलिटी शो है. या कहें कि एक सच्चाई है, जो चूंकि पर्दे पर देख रहे हैं, फिल्म के जरिए देख रहे हैं, इसलिए फिल्म सी लगती है. पर जिसने भी कुछ दिन कानपुर, उत्तर प्रदेश या उत्तर भारत में गुजारे हैं. वह इस सच्ची रील से बखूबी वाकिफ होगा.

कटियाबाज एक शहर की कहानी है. शहर का नाम कानपुर. अब कानपुर कितना कलाकार शहर है, ये आप किसी कनपुरिए से पूछिए. वो अपने कमीनपने को ऐसे बताएगा, जैसे किसी बड़े दिव्य रहस्य का आपको साझेदार बना रहा हो. कटियाबाज में कानपुर में बिजली कटौरी की समस्या और इसकी वजहों को कुछ किरदारों के जरिए दिखाया गया है. इसके केंद्र में है लोहा सिंह. लोहा सिंह जिसके मुंह में गुटखा भरा है. अंगुलियों पर जले के निशान हैं. हाथ में एक प्लास है और पैर बिजली के खंभे पर चढ़ने को बेताब हैं. लोहा सिंह बिजली के अवैध कनेक्शन के लिए पोल पर तार फंसाता है. लोकल लैंग्वेज में इसे कटिया कहते हैं. और लोकल लोगों की जबान में कहें तो लोहा सिंह अपने नाम की तरह सॉलिड है, लोहा है. बकौल लोहा, भइया हम एईसी कटिया डालते हैं कि मार आंधी में भी न हिले.

लोहा सिंह जैसे लोग बिजली की मार से लोगों को तात्कालिक राहत दिलाते हैं. वहीं एक ईमानदार युवा आईएएस अधिकारी रितु माहेश्वरी कानपुर के बिजली प्रबंधन और वितरण को दुरुस्त करना चाहती है. जाहिर है कि सालों के सड़े गले सिस्टम को बदलने के लिए सख्ती के साथ युक्ति और धैर्य की जरूरत है. रितु अपना काम कर रही है, लोहा अपना काम कर रहा है और तभी कटियाबाज में तीसरे किरदार की एंट्री होती है. ये हैं सपा के युवा रॉबिनहुड इमेज वाले विधायक हाजी इरफान सोलंकी. ये वही सोलंकी हैं, जिनके डॉक्टरों से झगड़े के बाद यूपी में इसी साल लंबी मेडिकल स्ट्राइक चली थी. बहरहाल, इरफान अपने समर्थकों के साथ ले तेल पानी बिजली विभाग वालों पर चढ़ बैठते हैं. इसी क्रम में एक दिन उनकी आईएएस रितु से भी हील हुज्जत हो जाती है. विधायक की बदतमीजी कोर्ट से जमानत पा बरी हो जाती है और चुनावों के बाद उन्हीं की सरकार आ जाती है.

और इसके बाद पूरे सिलसिले का एक चक्का घूमता है. काम करना चाह रही रितु मेज के पीछे फूलों के बुके के ढेर के पीछे हल्की सी नजर आ रही हैं. ये उनका विदाई समारोह है, जो नई सरकार की आमद के बाद आ गया है. रितु के कमरे की लाइट बुझ चुकी है. कानपुर ने अंधेरा चुना है. रितु की नेमप्लेट उतर गई है. रात घिर आई है. बाहर गांधी की मूर्ति है, जिसकी शकल पर छाई रौशनी भी छीज गई है.

मगर कहीं और सूरज उगा है. काउंटिंग बूथ के बाहर से जुलूस निकल रहा है. हाजी इरफान सोलंकी कार पर सवार हैं. फूलों से लदे हैं. और बिजली न आने से रात को ठीक से सोई नहीं जनता को हाथ हिला रहे हैं. जनता छज्जे से इस रेंगते ताकत के सूरज को देख रही है.

एक और किरदार है. लोहा सिंह. वह शराब के नशे में धुत्त है. एक चचा टाइप आदमी उसको गरिया रहे हैं. कह रहे हैं कि साले तुम हराम की पीते हो. लोहा भड़क जाता है. कहता है कि मैं जान जोखिम में डालता हूं और तुम इसे हराम की कहते हैं. लोहा लड़खड़ाता हुआ बाहर आता है. और फिर कुछ देर बाद एक झगड़े धकिया दिया जाता है. किसी ने उसकी डाली हुई कटिया में अपना तार डाल लिया है. नए लोहे की आमद हो रही है. पुराना शॉर्ट सर्किट हो रहा है.

कटियाबाज की एक खूबी यह भी है कि यह सबसे अर्ध सत्य पूरे एंगल और फ्रेम से दिखाता है. और अंत में किसी भी सतही निष्कर्ष पर पहुंचने का हड़बौंगापन नहीं दिखाता. उत्तर प्रदेश में या कानपुर में बिजली की बुरी हालत के लिए जिम्मेदार कौन है. जनता कहती है, पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां अपना काम ठीक से नहीं करतीं. सही तार नहीं, सही ट्रांसफार्मर नहीं, सही मीटर नहीं. उनके हिसाब से यही लाइनमैन चोरी करने के तरीके बताते हैं. उधर कंपनी के कर्ता धर्ता कह रहे हैं कि लोग ठीक बिल देना नहीं चाहते. बकायेदारों को जनता के वोटों से चुने नुमाइंदे बचाते हैं. ऐसे में जो बिल देते हैं, उन्हें भी कटौती का सामना करना पड़ता है. उन्हें भी महंगी बिजली झेलनी पड़ती है.

कटियाबाज एक कॉमिक त्रासदी है. इसकी शुरुआत वरुण ग्रोवर के लिखे और इंडियन ओशन बैंड के गाए गाने आधे जले चिराग के तले पूरा कानपूरा गाने से होती है. इस गाने के बीच शहर की बेतरतीबी के बीच की लय को मटमैली गंगा पर उतराते सूरज और बची खुची मिलों के हूटरों के जरिए दिखाया जाता है. इस त्रासदी का सबसे संगीन चेहरा तब सामने आता है, जब लोहा सिंह अंधेरे में चूल्हे पर पतीला चढ़ाए बैठी अपनी मां से मिलने आता है. मां से लोहा कहता है, खाना देओ. मां कहती है कुछ कमाकर लाओ. लोहा बाप को भला बुरा कहने लगता है और पसरकर टीवी पर हिटलर वाला सास बहू सीरियल देखने लगता है. मां बताती है, दाल बनी है. बेटा कहता है, कभी गोश्त भी बना लिया करो. मां कहती है, कमाकर लाओ. कुछ भी काम करो, ये बिजली का काम छोड़ दो. बेटा कहता है, हमें कुछ और नहीं आता. दिमाग खराब न करो. हम बिजली का काम ही करेंगे. यही कर सकते हैं. मां कहती है, न करो और रोने लगती है. बेटा पिछला गुस्सा भूल जाता है. हाथ बढ़ा मां के आंसू पोछने लगता है. कहता है, सब ठीक हो जाएगा. और फिर दाल में उबाल आ जाता है.

एक और मानवीय चेहरा है अधिकारी रितु महेश्वरी का. कर्मचारियों को कभी समझाती तो कभी हड़काती और घर आकर अपनी छोटी बेटी को चिड़िया की पहचान कराती. बातचीत में रितु कहती भी है. आसान है, दफ्तर में बैठकर रुटीन ढंग से काम कर लेना. मगर कुछ बदलना होगा, तो तय मानिए मुश्किलों के सामने के लिए तैयार भी रहना होगा.

कटियाबाज को धारदार सिर्फ इसके किरदार, कहानी का फ्लो या जबरदस्त एडिटिंग ही नहीं बनाते. ग्राउंड पर की गई मेहनत फुटेज कलेक्शन और शूटिंग में भी नजर आती है. महीनों के इत्मिनान से एक एक फ्रेम गढ़ा गया या कहें कि रियल टाइम में शूट किया गया. कहीं कोई फंक्शन चल रहा है और तंबू के ऊपर जलता तार गिरने लगता है. या फिर बिजली कटौती के मुद्दे पर गुस्साई भीड़ लाइनमैन से गाली गलौज और फिर थप्पड़बाजी करने लगती है. इलेक्शन के सीन, अधिकारियों के साथ व्यापारी नेताओं की मुखामुखम के सीन. सब पूरी तैयारी से रेकॉर्ड किए गए हैं. और इन सबको फिल्म के बीच ऐसे पिरो दिया गया है, जैसे ये सब इसी क्रम में घटने के लिए विवश थे.

इस फिल्म को बनाया है फहद मुस्तफा और दीप्ति कक्कड़ ने. फहद ने बताया कि वह कानपुर के उस चमनगंज इलाके के रहने वाले हैं, जहां की ये कहानी है. फहद छुटपन में ही ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना चले गए थे. उनके पिता जी मिल में काम करते थे. जब तीन बरस पहले फहद लौटे तो इरादा था, अपनी जमीं के बारे में कुछ बनाने का. इसी दौरान उनकी मुलाकात कटियाबाज लोहा सिंह से हुई. फिर एक एक कर तार जुड़ते चले गए. जब ये डॉक्युमेंट्री मुकम्मल हुई तो इन दोनों की मुलाकात बॉलीवुड के कुछ बागी प्रॉड्यूसर्स से हुई. अनुराग कश्यप, विकास बहल, विक्रमादित्य मोटवाने. इनका बैनर साथ आया तो कटियाबाज की पहुंच भी बढ़ गई और अब ये आपके दरवाजे पर है. आपको ये डाक्यू ड्रामा जरूर देखना चाहिए.

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Source: aajtak.intoday.in

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