फिल्म रिव्यूः हंसल मेहता और राजकुमार ने फिर मनवाया सिटी लाइट्स से अपना लोहा

29 May, 2014 12:36 PM

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फिल्म रिव्यूः हंसल मेहता और राजकुमार ने फिर मनवाया सिटी लाइट्स से अपना लोहा

दर बदर फिरे जाने तू कहां. ढूंढे तू जो पगले, नहीं वो यहां. नीति मोहन की सुरीली आवाज में ये गाना अपने मन के आकाश पर तैरने लगता है. फिर हम सब अपने अपने अलिखित इतिहास की पोथी के कुछ सूख चुके पीले पन्ने पलटने लगते हैं. हम सब जो कस्बों, गावों से शहर आए. इस उम्मीद के साथ कि यहां रौशनी है. ऊंचाई पर है तो क्या हुआ, हम भी अपना कद बढ़ा लेंगे. मगर कद बढ़ाने की इस पवित्र कोशिश में कितनी बार कदम लड़खड़ाते हैं ये सबने भीतर की जेब में खुसे नोट की तरह छिपा रखा है. इन्हीं कोशिशों का एक सिला है फिल्म सिटी लाइट्स. महेश भट्ट के प्रॉडक्शन और ‘शाहिद’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके डायरेक्टर हंसल मेहता की निगाह से गुजरी यह फिल्म, जो 1913 में रिलीज हुई ब्रिटिश फिल्म ‘मेट्रो मनीला’ का रीमेक है. मगर रीमेक के नाम से जो एक दिमागी कृपणता सूझती है, वह इस फिल्म से सिरे से नदारद है. यकीनन ये फिल्म असल जितनी ही अच्छी और ईमानदार और संवेदनशील बन पड़ी है.

दीपक और राखी राजस्थान के पाली जिले के एक गांव में रहते हैं. कपड़ों की दुकान चलाता है दीपक. कर्ज के बोझ तले एक दिन उसकी दुकान चली जाती है. फिर वह अपनी जिंदगी की इस उधड़ी सीवन की तुरपाई करने मुंबई आता है. एक ऐसा शहर, जो काम को पहचान देता है. पर दीपक के केस में यह अपने दूसरे नाम मायानगरी को ज्यादा चरितार्थ करता है. स्टेशन से बाहर निकलते ही फरेब की फांस उसके कदमों में चुभ जाती है. अपनी बच्ची और पत्नी को साथ लिए वह एक ठिकाना और एक काम की तलाश में दर दर भटकने लगता है. इस दौरान हाशिये पर पड़े कई लोग मसलन, एक बार नाच गर्ल और एक गार्ड उसकी मदद करते हैं.

जिंदगी पटरी पर आती दिखती है. शुरुआत झिझक के बाद राखी बार में काम करने लगती है और दीपक को एक प्राइवेट सिक्युरिटी एजेंसी में नौकरी मिल जाती है. इस दौरान उसका मददगार बन सामने आता है उसी एजेंसी में काम करता एक और कस्बाई महत्वाकांक्षी या कहें कि महानगर सा चंट युवक विष्णु. दीपक का यह नया दोस्त उसे जिंदगी के मजे लेना सिखाने की कोशिश करता है. कभी शराब तो कभी शबाब की कहानियां सुनाता है. बताता है अपने साइड बिजनेस के बारे में. और आखिर में अपने प्लान में मनुहार, धमकी और प्रलोभन के सहारे उसे शामिल कर लेता है.

जल्द अमीर होने का ये लालच किसे कहां ले जाता है. ये सिटी लाइट्स की रौशनी के ऐन नीचे पसरे अंधेरे में एक भद्दे पर चमकीले सच की तरह रौशन होता है. ग्रीक त्रासदी की तरह आखिर में जब ईनाम मिलता है, तो उसका मजा बेतरह कसैला साबित होता है.

फिल्म के कई दृश्य आपके दिमाग के ड्राइंगबोर्ड पर हमेशा के लिए टंक जाते हैं. घुटनों में मुंह छिपा रोते पति पत्नी. शराब पीने के बाद पत्नी से थप्पड़ खा बेहाल होता मर्द. बार मालिक से थप्पड़ खाती औरत. एक ईमानदार आदमी के पिस्तौल तानने की बेबसी. और अंत में अचानक इन सब से भाग बचने की कोशिशों की पीठ पर सन्नाटे का लिहाफ उतार लगती गोली.

फिल्म के नायक अगर उसे नायक कह सकूं तो, राजकुमार हैं. कितना लंबा और शानदार सफर तय किया है गुड़गांव के इस लड़के ने. एलएसडी का कामुक एमएमएस का मारा सेल्स सुपरवाइजर. फिर रागिनी एमएमएस का जालसाज बॉयफ्रेंड. शाहिद का आत्मा की कराह का संगीत, क्वीन का बातों के गुलगुले बनाता राजा और अब ये आत्महंता आस्था से निर्मित दीपक. महेश भट्ट ने कॉफी विद करण में दुरुस्त कहा था. राजकुमार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का भविष्य है.

फिल्म की एक्ट्रेस पत्रलेखा ने भी राखी के किरदार को जान बख्शी है. राजस्थानी बोली बानी, झिझक और साहस को उन्होंने पर्दे पर साकार कर दिया है. फिल्म का कुछ समय के लिए तीसरा कोना बन उभरते हैं थिएटर की बैकग्राउंड से आए मानव कौल. मानव ने भी अपनी तैयारियों की एक पुख्ता रेंज दिखाई है.

अच्छी कहानी, शानदार एक्टिंग के अलावा फिल्म की एक और खूबी है इसके गाने. महेश भट्ट मार्का. अरिजित सिंह की आवाज में ‘मुस्कुराने की वजह तुम हो, गुनगुनाने की वजह तुम हो. जिया जाए न जाए न, ओ रे पिया रे’ पहले ही पब्लिक की निगाह में चढ़ चुका है. उन्हीं की आवाज में एक और दार्शनिक सा गाना है, एक चिरैया घोंसले को छोड़ उड़ उड़ जाए. और ये सोचे काश ऐसे दो कदम मुड़ जाए.

डायरेक्टर हंसल मेहता दिल पे मत ले यार जैसी आंख खोल फिल्म बना चुके हैं. शाहिद के बाद उनकी फिर से वापसी हुई. और कुछ ही महीनों के अंतराल के बाद ये शाहकार. अब बिलाशक उनके अगले प्रोजेक्ट्स का इंतजार रहेगा. हंसल ने परिचित मुंबई नहीं दिखाई. उसके नीचे बसी समंदर सी खारी मुंबई दिखाई. कहीं भी उनके किरदार अपनी चीख की आवाज तेज नहीं करते हैं. और इसी वजह से वह हमारे साथ ठहर जाती है. फिल्म की लोकेशन के अलावा डायलॉग्स की अदायगी में भी बहुत होमवर्क साफ नजर आता है.

फिल्म सिटी लाइट्स जरूर देखिए. ये हमारे अंधेरों से लड़ने की कहानी है. ये दीपक की रौशनी की तलाश की कहानी है.

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Source: aajtak.intoday.in

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