बच्चों को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाती भूतनाथ रिटर्न्स

11 April, 2014 4:04 AM

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बच्चों को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाती भूतनाथ रिटर्न्स

राजनीति भारत की सबसे क्रूर सच्चाई है और फिल्में सबसे हसीन फंतासी. अकसर बॉलीवुड पर ये इल्जाम लगता है कि यह सच्चाई से प्रायः कोसों दूर रहती है. मगर हालिया ट्रेंड को देखें तो राजनीतिक पृष्ठभूमि पर कई फिल्में सामने आई हैं. कुछ ही हफ्ते पहले गांधी परिवार की सियासत को केंद्र में रखकर अमीर प्रोड्यूसर के फ्लॉप एक्टर सुपुत्र जैकी भगनानी की फिल्म यंगिस्तान आई थी. इस फिल्म में युवा जोश को आगे रखकर लोकतंत्र को संवारने का सपना बेचा गया था. फिल्म औंधे मुंह गिरी. अब आई है 'भूतनाथ रिटर्न्स', जिसमें एक बार फिर नए सिरे से मौजूदा लोकतंत्र को आइना दिखाने की कोशिश की गई है. इस बार आम आदमी पार्टी के उभार से पैदा हुए तर्कों का इस्तेमाल किया गया है.

कहानी का कुछ आइडिया

फिल्म वहीं से शुरू होती है, जहां साल 2008 में आई इसकी प्रीक्वल 'भूतनाथ' खत्म हुई थी. कैलाश नाथ उर्फ भूतनाथ बंकू नाम के बच्चे को डराने में नाकामयाब होते हैं और फिर उसके दोस्त बन जाते हैं. उसका परिवार शांति पाठ करवाता है और कैलाशनाथ धरा से मुक्त हो भूत वर्ल्ड पहुंच जाते हैं. मगर यहां हर कोई उनका मजाक बना रहा है. भूत होकर बच्चे को भी नहीं डरा पाए. भूतनाथ यह जिल्लत बर्दाश्त नहीं कर पाता और तब उसे मिलता है एक असाइनमेंट. पृथ्वी पर वापस जाओ और दो चार बच्चों को डराओ तो सम्मान लौट आएगा.

भूतनाथ पहुंचते हैं धारावी. एशिया का सबसे बड़ा स्लम. और यहां उनकी मुलाकात होती है अखरोट नाम के एक गरीब बच्चे से. मगर पेच यह है कि बंकू की तरह अखरोट भी भूतनाथ को देख सकता है. जल्द ही भूतनाथ और स्ट्रीट स्मार्ट अखरोट में दोस्ती हो जाती है. भूतनाथ की मदद से अखरोट चार पैसे इज्जत से कमाने लग जाता है. फिर अखरोट एक ऐसा काम हाथ में ले लेता है, जिसके लिए न सिर्फ उसे बल्कि भूतनाथ को भी भूतों की खरी खोटी सुननी पड़ती है. ये काम है एक गुंडे से नेता बने शख्स भाऊ की मदद करने का.

इस गलत काम को सही करने के लिए अखरोट भाऊ के खिलाफ भूतनाथ को चुनाव लडऩे के लिए कहता है. शुरुआती ना-नुकुर के बाद कानून की तकनीकी कलाबाजियों के सहारे भूतनाथ चुनाव मैदान में उतर जाता है. अब मुकाबला शुरू होता है घाघ नेता और आम जनता के नुमाइंदे के बीच. इसी रस्साकशी का नाम है 'भूतनाथ रिटर्न्स'.

किन बातों पर रहा है फोकस

फिल्म में भूत हैं, मगर क्यूट हैं. रामसे ब्रदर्स की दुनिया की तरह खून टपकाते बुरा चेहरा बनाते हुए नहीं हैं. उनके भूत वर्ल्ड की भी वैसी ही मुश्किलें हैं, जैसी यहां धरती पर हैं. भारत की समस्याओं खासतौर पर भ्रष्टाचार जो हर स्तर पर व्याप्त है, उस पर खूब फोकस किया गया है. चुनावी राजनीति के तमाम दांव पेच भी खाए गए हैं. मसलन, वोटर वोट नहीं डालता तो शिकायत का क्या मतलब. जनता ऐन मौके पर बिक जाती है तो फिर सियासत को क्यों कोसे. इसके अलावा बच्चे जो देश का भविष्य हैं, उनकी भूत के साथ जुगलबंदी कर वर्तमान को सुधारने का दर्शन भी पसरा हुआ है.

किसने की कैसी एक्टिंग

अमिताभ बच्चन भूतनाथ के रोल में कभी मजाकिया तो कभी संजीदा लगे हैं. अखरोट के रोल में टूटे दांत वाले बच्चे पार्थ ने जबरदस्त काम किया है. बच्चन साहब सही ही कहते हैं कि इन बच्चों की एक्टिंग देखकर लगता है कि अभी मुझे बहुत कुछ सीखना है. खैर, ये तो उनका बड़प्पन है. भाऊ के रोल में बोमन ईरानी और उनके गुर्गे के रोल में ब्रजेंद्र काला भी जमे हैं. फिल्म आंखों देखी के बाऊ जी यानी संजय मिश्रा यहां एक ऐसे वकील के रूप में नजर आए हैं, जो सच्चाई का मारा है और मजबूरन काला कोट धूल से अटी अलमारी में रख कुछ और काम करने को मजबूर है. उनकी बेचारगी और फिर संकल्प शानदार है.

गाने और बाकी सब कुछ फिल्म के दो गाने पहले ही सुपरहिट हो चुके हैं. मीट ब्रदर्स अंजान और मीका का पार्टी तो बनती है और योयो हनी सिंह का आफ्टर पार्टी. इसके अलावा धारावी स्लम भी ठीक है. मगर फिल्म के बीच में एक डॉक्युमेंट्री नुमा ढंग से भारत की गरीबी के कई करुण दृश्य दिखाता गाना साहिब बोझिल हो जाता है और फिल्म की रफ्तार को भी कम कर देता है. फिल्म की लेंथ भी कुछ ज्यादा है. फर्स्ट हाफ में यह कुछ सुस्त रहती है. हालांकि सेकंड हाफ में रफ्तार पकड़ती है. कुछ एक बार डिटेल्स और संदेश देने के चक्कर में फिल्म बोझिल भी होने लगती है. भूतनाथ रिटर्न्स की खासियत ये है कि इसमें दैवीय शक्तियों के बजाय इंसानी ताकत और कमजोरियों के ताने बाने के सहारे कहानी बुनी गई है. भूतनाथ रिटर्न्स एक भूत की कहानी है, मगर भुतिया कतई नहीं है. फिल्म में बच्चों के मनोविज्ञान और उन्हें सदाचार सिखाने की भावना जोरों पर है. डायरेक्टर नितेश तिवारी इससे पहले चिल्लर पार्टी जैसी शानदार फिल्म से जुड़े रहे हैं. यहां भी उनके डायरेक्शन का हुनर खूब नजर आता है.

फिल्म भूतनाथ रिटर्न्स वन टाइम फैमिली वॉच है और छुट्टी के सीजन में बच्चों के लिए एक अच्छी आउटिंग भी. यानी पार्टी तो बनती है.

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Source: aajtak.intoday.in

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