बर्थडे विशेष: लता मंगेशकर का खास इंटरव्यू पढ़ें-देखें

28 September, 2014 11:23 AM

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आईबीएन-7 | Sep 28, 2014 at 03:52pm | Updated Sep 28, 2014 at 04:51pm

जावेद- आज मुझे ये इज्जत मिली है कि मैं आपसे कुछ अपनी तरफ से, कुछ दूसरों की तरफ से कुछ सवाल करूं। और एक वो बहुत मशहूर म्यूजिकल फिल्म थी। साउंड ऑफ म्यूजिक उसमें एक बहुत अच्छी लाइन थी। लेट्स स्टार्ट फ्रॉम द वेरी बिगिनिंग ए वेरी गुड प्लेस टू स्टार्ट। तो हम भी बिगिनिंग से ही करते हैं। हम सब जानते हैं कि आपका संबंध म्यूजिक से दो तरह से है। आपके खून में भी है और घुट्टी में भी है। जिस माहौल में आप पली-बढ़ी हैं। जिस पिता की आप सुपुत्री हैं। हर तरफ म्यूजिक ही था। तो बहुत बचपन में आपको कहां, किस उम्र में पहली बार ये महसूस हुआ कि मैं गा सकती हूं और मैं गाऊंगी?

जावेद अख्तर– जाहिर है कि आप बहुत छोटी रही होंगी आप इसलिए कि मेरे ख्याल से 13-14 साल की उम्र में तो आपने अपना पहला गाना ही गा दिया था?

जावेद अख्तर– आपको वो दिन याद है कि कैसे आप घर से निकलीं, कैसे गईं? ये बहुत बड़ा एक्सपीरिएंस होगा? पहली बार गाना रिकॉर्ड हो रहा है?

लता- हां, मैं उससे पहले क्लासिकल प्रोग्राम करती थी मेरे पिताजी के साथ, तो उतना डर नहीं लगा। सिर्फ वहां जाकर वसंत जोगलेकर उसके डायरेक्टर थे। और उस जमाने में स्वर्णलता करके एक हिरोइन थी। वो थी वहां पर। गाना गाकर मैं शाम को वहां से निकल आई। बहुत देर तक वो चलता रहा। फिर वो पिक्चर बनी नहीं। ये बात मार्च की है। अप्रैल में मेरे पिताजी की डेथ हो गई। पिताजी की डेथ होने के बाद घर में पैसे लाने वाला कोई नहीं रहा। हम लोग 4 बहनें और एक भाई थे और मैं सबसे बड़ी। मां बहुत परेशान हो गई। तो मेरे पास मास्टर विनायक आए और उन्होंने कहा कि तुम मेरी पिक्चर में काम करोगी क्या?

जावेद अख्तर– ये मास्टर विनायक वहीं हैं जिनकी बेटी बहुत मशहूर हिरोइन थीं?

जावेद अख्तर- प्ले बैक सिंगिंग में आप अचानक कैसे आईं। ये पहला कदम कैसे उठा?

जावेद अख्तर- कोई भी आर्टिस्ट हो वो चाहे सिंगर हो, पोएट हो, म्यूजिशियन हो, पेंटर हो जब वो शुरू करता है काम तो वो उनपर अलग-अलग तरह के प्रभाव होते हैं। आप पर आपके पिताजी का प्रभाव होगा। उस समय के वो सिंगर जिन्हें आपने पसंद किया होगा उनका प्रभाव होगा लेकिन फिर धीरे-धीरे इंसान अपनी आवाज, अपनी पहचान ढूंढता है। वो कौन सा गाना था, वो कौन सा स्टेज था जब आपको लगा कि आपने लता मंगेशकर को पहचान लिया है। ये है लता मंगेशकर?

जावेद अख्तर- आप क्लासिकल पहले गा रही थीं। और आप एक प्लेबैक सिंगर हैं कि जिनके बारे में मैं हिंदुस्तान के बड़े-बड़े क्लासिकल सिंगर्स और क्लासिकल म्यूजिशियंस से मिला हूं और उनके अंदर बड़ा रिजर्वेशन होता है कि अरे भई फिल्म का गाना क्या, ये तो 5 मिनट का काम होता है। लेकिन एक इंसान के वो कायल हैं जो कि आप हैं। तो आपको कभी ऐसा ख्याल आता है कि मैं क्लासिकल सिंगर हो गई होती? इधर न जाती, उधर चली जाती?

जावेद अख्तर- ये जो है दरअसल प्लेबैक सिंगिंग का काम एक तरह से वो जो क्रिकेट में गुगली की बॉल। आप क्रिकेट के बारे में इतना जानती हैं इसलिए मिसाल दे रहा हूं कि वो दिखता लेग ब्रेक है और लेकिन ऑफ ब्रेक ऐसे जा रहा है। तो होता ये है कि आप गाना गाती हैं और आपको मालूम है कि स्क्रीन पर किसी और चेहरे से किसी और होठों से गाना सुना जाएगा। तो ये जो इनडायरेक्टली है गाना गाना। ये क्या अलग तरह का तजुर्बा होगा। इसपर आपको किन-किन बातों का ख्याल रखना पड़ता है?

जावेद अख्तर- मैं अगर ये पूछूं हालांकि आपसे ये पूछना बड़ा अजीब सा है कि क्या आपको कभी कोई गाना मुश्किल लगा?

जावेद अख्तर– भई मेरे ख्याल से आमतौर से यही हुआ है कि जब आपने गाया है तो म्यूजिक डायरेक्टर ने सोचा कि मैंने क्या बनाया था और इसने क्या गा दिया!

अमिताभ- लता जी जीवन के 80 वर्ष पूरे कर लिए आपने। मेरे और मेरे परिवार की ओर से बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बहुत सारा प्यार। आप चिरआयु हों, स्वस्थ हों, खुश रहें यही ईश्वर से हमारी कामना है। मुझसे कहा गया है कि आपसे एक प्रश्न पूछा जाए तो लता जी मेरा मानना है कि संगीत का सही सुर एक ऐसा तार होता है जो मनुष्य को ईश्वर के साथ जोड़ता है जिससे आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है। एक आम प्राणी के लिए उसके सारे जीवन में ऐसा अनुभव शायद ही उसके लिए संभव हो, लेकिन आपके जीवन का हरएक पल इस तार के द्वारा ईश्नर से जुड़ा रहता है। हर पल ऐसी दिव्य शक्ति के साथ जुड़े रहने में आपका अनुभव कैसा रहा है?

जावेद अख्तर- चलिए अभी आपने एक बड़े ऐक्टर को देखा है तो कुछ ऐक्टिंग के बारे में ही आपसे सवाल करते हैं। आपने भी तो ऐक्टिंग की हुई है?

लता– दूसरा सवाल आपका था कि वो कौन शख्स है जिसका राइटर या म्यूजिक डायरेक्टर कोई भी तो इस सवाल का जवाब देना बहुत मुश्किल है क्योंकि ऐसे बहुत से राइटर थे जिन्होंने बहुत से अच्छे-अच्छे गाने लिखे और वो गाना सुनने के बाद अच्छा लगा। म्यूजिक डायरेक्टर भी बहुत थे जिन्होंने मेरे गाने बनाए। सलिल दा के गाने गाते वक्त मुझे बहुत अच्छा लगता था। मदन भैया के गाने मुझे बहुत पसंद थे। और एस डी बर्मन साहब, आर डी बर्मन, जयदेव जी जिनका अल्लाह तेरो नाम गाना मुझे बहुत अच्छा लगता है तो किसी एक आदमी के बारे में कहना बहुत मुश्किल है मेरे लिए। अब रही आपकी रिक्वेस्ट तो अभी गाना तो मेरे लिए मुश्किल है पर मैं इतना ही कहती हूं कि ‘ऐ क्या बोलता तू’ ?

Source: khabar.ibnlive.in.com

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