बहुत सच्ची और अच्छी फिल्म है संजय मिश्रा और रजत कपूर की आंखों देखी

20 March, 2014 12:29 PM

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बहुत सच्ची और अच्छी फिल्म है संजय मिश्रा और रजत कपूर की आंखों देखी

राजा बाबू गुस्सा हैं. उनका आगे के बटन वाला स्वेटर भी गुस्से में शरीर पर उतरता सा टंगा है. सफेद दाढ़ी भी है. जो इस गुस्से को एक किस्म की सात्विकता दे रही है. राजा बाबू गुस्सा हैं क्योंकि उनके भतीजे को मैथ्स के टीचर ने फेल कर दिया. पहुंच गए बाबू जी स्कूल. मास्टर से कहा, ये क्या पढ़ाते हो. समानांतर रेखा क्या है. जो इनफाइनाइट पर जाकर मिल जाए. अगर मिल गई तो समानांतर रेखा कैसे है मास्टर जी. गुस्से में भी राजा बाबू सेंस की बात करते हैं. अनुभव की और अपने सच की बात करते हैं. फिल्म आंखों देखी भी ऐसी ही है. अंत को छोड़कर. खैर, अंत पर बात अंत में. फिलहाल बात समानांतर रेखाओं की. एक रेखा, वह जीवन, जो हम जी रहे हैं. दूसरी वह, जो हम जीना चाहते हैं. जिसकी तरफ हमारी समझ हमें धकेलती है. ये दोनों रेखाएं समानांतर चलती हैं और इनके बीच में चलता है आदमी. कभी दायें तो कभी बायें करता.

आंखों देखी लोग देखें क्योंकि इसे देखने के बाद मन मुझसे कहता है, प्यारे इसे कहते हैं एक्टिंग. और इसे कहते हैं कहानी. एक्टिंग भी कैसी. कि कहानी सुनते-सुनते आप अपनी जिंदगी के वाकये उसमें जोड़ने-घटाने लगें. संजय मिश्रा की कॉमेडी के तो सब पंखे हैं. मगर उनकी रेंज कितनी बड़ी है, ये इस फिल्म से नजर आया. और सिर्फ मिश्रा ही क्यों, रजत कपूर, नमित दास, सीमा पाहवा, तरनजीत कौर...लंबी लिस्ट है. मगर एक भी नाम ऐसा नहीं गिना सकता, जिसकी एक्टिंग कच्ची रही हो. और उसका श्रेय इन जांबाजों के साथ-साथ फिल्म के डायरेक्टर रजत कपूर को भी दिया जाना चाहिए.

ये कहानी है पुरानी दिल्ली की तंग गली के छोटे मकान में रहते एक परिवार की. बाबू जी और अम्मा. उनके दो बच्चे रीटा और शम्मी. फिर ऋषि चाचा और लता चाची. उनका भी एक बच्चा. इस भरे पूरे परिवार के लिए हैं दो छोटे कमरे और बीच का एक दालान. मगर गौर करिए. जगह कम है, तंग नहीं. सब एक दूसरे के फटे में टांग अड़ाते हैं. हंसते हैं, मुस्कुराते हैं. लड़ते हैं-झगड़ते हैं. और एक दिन और खिसक जाता है. पर तभी रीटा के लफड़े का पता चलता है. मोहल्ले का लौंडा घर आकर आग छुआ जाता है. कोई बदमाश है. अज्जू नाम है. उसी के साथ दिखती है रीटा. बस फिर क्या. लड़की के प्यार को छज्जे पर फेंक पहुंच जाते हैं, चाचा फूफा. बताने कि हम कित्ते बड़े गुंडे. मगर बाबू जी ऐसा नहीं कर पाते. उन्हें अज्जू सच्चा लगता है. यहीं उन्हें होता है महाज्ञान. सुनी सुनाई पर दुनिया चली जा रही है. बल्कि भागी जा रही है. आंखों देखी जुटाने का किसी के पास सबर नहीं. समझ नहीं.

आंखों देखी को मानने के फैसले के बाद जिंदगी बदल जाती है. बाबू जी की जिद सबको सनक लगती है. मगर वह इसके लिए नौकरी, दुआ सलाम, समाज सब को ठोकर पर रख अपने दांडी मार्च पर बढ़े चलते हैं. कभी शेर की दहाड़ सुनने जाते हैं और पाजामे में मूत मारते हैं, तो कभी करंट लगा बताते हैं कि दूसरों से भी कुछ सीखा जा सकता है.

ये फिल्म आप जरूर देखिए. फिल्म की रफ्तार कहीं सुस्त नहीं पड़ती. इमोशनल अत्याचार ही नहीं, तीखे व्यंग्य और निश्चल दूधिया हंसी को प्रोत्साहित करते मजाक हैं. दिल्ली की नजर आती परतों के नीचे जो एक परिकथा है, धूसर रंग की. वह नजर आती है.

और अब अंत की बात. ये अंत आपको बहुत ज्यादा बेढंगा लग सकता है. ऐसा लगता है कि रजत कपूर का थिएटर उन पर हावी हो गया. उन्होंने आखिर में दिखाया भी. कि ये फिल्म मेरे गुरु कुमार शाहनी और मणि कौल को समर्पित है. ये दिग्गज सिनेमा में प्रयोगों के लिए जाने जाते थे. मगर आंखों देखी तो इस अंत के पहले तक ऋषिकेश मुखर्जी नुमा फिल्म लगती है. मध्यवर्गीय चिंताओं और संवेदनाओं से बुनी. हल्की-फुल्की मगर गहरा सबक देती. तो ऐसे अंत का क्या तर्क. शायद रजत देखना चाहते हों कि इनफाइनाइट पर लकीरें मिलती हैं या नहीं, उसके लिए कुछ असंभव सा जान पड़ता किया जाए.

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Source: aajtak.intoday.in

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