मूवी रिव्यू: कश्मीर की तरह उलझी हुई मगर खूबसूरत है 'हैदर'

2 October, 2014 6:53 AM

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आज जब हर निर्माता-निर्देशक और फिल्म स्टार सिर्फ और सिर्फ 100 करोड़ क्लब के लिए फिल्म बनाने के सपने देखता है, निर्देशक विशाल भारद्वाज शायद अकेले ऐसे फिल्मकार है जो चुनिंदा दर्शकों को ध्यान में रखकर ही महंगी और अलग फिल्में बनाते हैं. ये यही है या ग़लत इस बात की चर्चा किए बिना हैदर का ज़िक्र करते हैं. हैदर, शेक्सपियर के नाटक 'हैमलेट' पर आधारित है जो एक परिवार के बर्बाद होते हुए रिश्तों पर आधारित ट्रेजेडी है. फिल्म का कैनवास बड़ा करने के लिए विशाल ने इस कहानी की सेटिंग 90 के दशक में आतंकवाद से जूझते कश्मीर में की है.

श्रीनगर के डॉक्टर हिलाल (नरेन्द्र झा) अपने घर में छुपा कर एक आतंकवादी का इलाज करते हैं. ऐन वक़्त पर भारतीय सेना को खबर मिल जाती है और उनके घर को बम से उड़ा दिया जाता है. डॉक्टर हिलाल को सेना ले जाती है और इसके बाद उनका कोई पता नहीं चलता. उनकी पत्नी ग़ज़ाला (तब्बू) अपने देवर ख़ुर्रम (के के मेनन) के घर चली जाती है. हिलाल का बेटा हैदर (शाहिद कपूर) अलीगढ़ में पढ़ता है और इस घटना की खबर के बाद जल्दी कश्मीर लौटता है.

लेकिन यहा आकर सबसे पहले जो बात उसे नज़र आती है वो है उसकी मां और चाचा की नज़दीकियां. वो ये देखकर बुरी तरह हिल जाता है. हैदर अपने पिता की तलाश में जुटा रहता है. इस काम में उसकी मदद करती है प्रेमिका अर्शिया (श्रद्धा कपूर). इसी तलाश के दौरान उसकी मुलाकात रूहदार (इरफ़ान ख़ान) से होती है जो उसे बताता है कि उसके पिता मर चुके हैं और इस पूरी साज़िश में उसके चाचा और मां का हाथ है. ये बातें हैदर को पागल कर देती हैं और बदला लेना उसकी ज़िंदगी का मक़सद बन जाता है.

फिल्म में दिखाया गया 1995 का कश्मीर, रोमांस वाला खूबसूरत कश्मीर नहीं, बल्कि खून से सना, गोलियों की आवाज़ से दहशतज़दा कश्मीर है और फिल्म की सिनेमैटोग्राफ़ी बेहद खूबसूरती से ये बात बयां करती है. लगभग पौने तीन घंटे की, धीमी गति से चलती इस फिल्म का पहला भाग बहुत अच्छा है. कहानी का ये हिस्सा आपको उस दौर के कश्मीर में ले जाता है. निर्देशक ने एक परिवार की कहानी के साथ-साथ कश्मीर के हालात पर राजनीतिक स्टेटमेंट करने की अच्छी कोशिश भी की है.

किस तरह एक छोटा सा बैग लेकर चलने पर भी आपकी सड़क के बीचों-बीच तलाशी होती है और किस तरह दिन-दहाड़े लोग 'disappear' हो जाते हैं. फिल्म के सह-लेखक बशारत पीर भी फिल्म के ऐसे ही एक बेहतरीन सीन में नज़र आते हैं. 'आधी विधवाएं', सेना और कश्मीरियों के बीच की बातचीत, डिटेन्शन सेंटर्स के सीन...ये सब उस माहौल की तस्वीर बयां करते हैं.

लेकिन दूसरे भाग में अचानक फिल्म बोझिल हो जाती है. कश्मीर के हालात और मां-बेटे के उलझे हुए रिश्तों की कहानी को अचानक बदले पर आधारित थ्रिलर बनाने की कोशिश की जाती है. फिल्म खिंचती जाती है और अंत में मणिरत्नम की फिल्म 'दिल से' जैसे क्लाईमैक्स पर आकर खत्म हो जाती है. ये क्लाईमैक्स, नाटक हैमलेट से अंत से बिलकुल अलग है और कमज़ोर भी. फिल्म की लंबाई भी बहुत ज़्यादा है.

शेक्सपियर ने हैमलेट में मां और बेटे के प्यार का रिश्ता बड़े अलग अंदाज़ मे बयान किया था, फिल्म को दो सीन में विशाल भारद्वाज ने काफ़ी हद तक उसे पर्दे पर उतार दिया है. ऐसा हिंदी सिनेमा में पहली बार हुआ है.

फिल्म का बैकग्राउंड म्यूज़िक बहुत ही बेहतरीन है और इसे समझने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. गुलज़ार के लिखे गीत फिल्म के बीच में बहुत असर छोड़ते हैं. ख़ासतौर पर बिस्मिल का फिल्मांकन लाजवाब है.

फिल्म के कई सीन शानदार है. काश पूरी फिल्म के बारे में ये बात कही जा सकती. फिर भी मकबूल और ओंकारा के बाद ये विशाल भारद्वाज की अच्छी फिल्मों से एक गिनी जाएगी.

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या ये फिल्म दर्शकों का मनोरंजन करेगी? मीडिया के लिए हुए ख़ास शो में फिल्म समीक्षकों के अलावा कुछ आम दर्शक भी मौजूद थे. इंटरवल में मैंने तीन दर्शकों से बात की. तीन जवाब मिले- 'ज़रा स्लो है', 'ठीक है' और 'अब इरफान आया है शायद अब मज़ा आए'. हो सकता है कि इन तीन दर्शकों के अलावा ये फिल्म बाकी दर्शकों को पसंद आ जाए.

आज सुबह ऋतिक-कटरीना की एक्शन फिल्म बैंग-बैंग के लगभग सारे शोज़ हाउसफुल हैं. हैदर के टिकट आसानी से मिल रहे हैं. ये विडंबना तो है लेकिन हिंदी मसाला फिल्में देखने वालों दर्शकों को जब ऐसी फिल्में पसंद आए वो समय शायद अभी दूर है.

Source: abpnews.abplive.in

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