मूवी रिव्यू: घिसी-पिटी कहानी में खूब लड़ी 'मर्दानी'

22 August, 2014 10:18 AM

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हमारे समाज में असली पुलिस की जो भी इमेज हो लेकिन सिल्वर स्क्रीन पर पुलिस अफसर के रोल निभाने का शौक़ अब भी हर फिल्मस्टार को है. पिछले हफ़्ते सिंघम रिटर्न्स थी और इस हफ़्ते रानी मुखर्जी की कमबैक फिल्म मर्दानी है. मर्दानी को देखकर पहला ख़याल ये आता है कि निर्देशक कन्फ्यूज़ है कि रानी मुखर्जी को सिंघम जैसा सुपरहीरो पुलिस अफ़सर दिखाए, या फिर अब तक छप्पन जैसा वास्तविकता के करीब किरदार. बढ़िया पहले भाग के बाद, दूसरे भाग में फिल्म बहुत औसत हो जाती है.

मुंबई क्राइम ब्रांच की अफसर शिवानी शिवाजी रॉय (रानी मुखर्जी) को पता चलता है अनाथालय में रहने वाली एक लड़की प्यारी पिछले कुछ दिन से गायब है. शिवानी ही प्यारी को कुछ साल पहले इस अनाथालय में लाई थी. जब वो तहक़ीक़ात शुरू करती है तो पता चलता है कि और भी कई लड़कियां ग़ायब हैं. इस बात के सुराग़ मिलते हैं कि लड़कियों की तस्करी का एक पूरा ऑरगनाइज़्ड रैकेट चल रहा है. शिवानी इस गैंग को बेनक़ाब करने में जुट जाती है. गैंग के सरगना वॉल्ट (ताहिर भसीन) है जो बेहद चालाक है. शिवानी को रोकने के लिए वो कई चालें चलता है लेकिन आखिर में शिवानी उस तक पहुंच जाती है और उसे ख़त्म कर देती है.

फिल्म की कहानी वाक़ई इतनी ही सीधी है और ऐसा कुछ नहीं है जिसे ज़बरदस्त कहा जा सके. पूरी फिल्म गंभीर है, इसमें कोई कॉमेडी सीन या गाना नहीं है. लेकिन परेशानी ये है कि स्क्रीनप्ले बेहद सपाट है और दर्शकों को आसानी से अंदाज़ा होता है कि आगे क्या होने वाला है. फिल्म का सब्जेक्ट और कई सीन आपको हॉलीवुड की सुपरहिट थ्रिलर Taken की याद दिलाएंगे लेकिन Taken में जहां बहुत बढ़िया एक्शन और डायलॉग थे, मर्दानी में ना एक्शन है, ना कोई ट्विस्ट या सस्पेंस.

रानी मुखर्जी ने हमेशा की तरह अच्छा अभिनय किया है लेकिन उनके असरदार सीन कम हैं. फिल्म में वो अपने खामोश चेहरे से बहुत कुछ कह जाती हैं। मगर सपाट स्क्रीनप्ले से वो मार खा गई हैं. फिल्म के सबसे ख़ास किरदार फिल्म में विलेन बने ताहिर भसीन हैं. आम खलनायकों से अलग उन्होंने बहुत अच्छा अभिनय किया है. फिल्म के सबसे अच्छे सीन वह है जिसमें उनकी और रानी मुखर्जी की बातचीत होती है. फिल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत है फिल्म की कास्टिंग. खलनायकों की गैंग के किरदार हों या फिर पुलिसवाले, हर किसी ने बहुत अच्छा अभिनय किया है. फिल्म के सब्जेक्ट और कुछ सीन में गालियों के इस्तेमाल की वजह से सेंसर बोर्ड ने फिल्म को A सर्टिफिकेट दिया है. इसका असर फिल्म के फैमिली ऑडियन्स पर पड़ेगा.

2 घंटे से भी कम समय की ये फिल्म ह्यूमन ट्रैफिकिंग जैसे गंभीर विषय को उठाती है और कहीं भी इस विषय से नहीं भटकती. लेकिन अंत तक पहुंचते पहुंचते ये बिलकुल फिल्मी बन जाती है. मर्दानी बेहतर हो सकती थी लेकिन फिर भी सिंघम रिटर्न्स जैसे सिनेमा के मुक़ाबले ये अच्छी कोशिश है.

Source: abpnews.abplive.in

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