मूवी रिव्यूः ठगने की नाकामयाब कोशिश करता है ये नटवरलाल

29 August, 2014 1:28 PM

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मूवी रिव्यूः ठगने की नाकामयाब कोशिश करता है ये नटवरलाल

इमरान हाशमी की शायरी पिट गई. अब वह कभी लिफ्ट में तो कभी नहाने वाली नांद में चूमा चाटी करते हैं, तो बासीपन की बू आती है. और यही बू उनकी फिल्म नटवरलाल में आती है. मेरे बगल में बैठी और ढाई में दो घंटे चटर मटर पटर करने वाली कन्या ने भी इंटरवल में ही एंड बता दिया था. पाकिस्तानी हीरोइन हुमैमा मलिक अपने मुल्क से आयात हुई पहले की हीरोइन से बेहतर हैं. तो क्या हुआ जो उनकी भौंहें हड़प्पा काल की करिश्मा कपूर की याद दिलाती हैं. परेश रावल हमेशा की तरह अपने ठहरेपन में ठंडक का ऐहसास दिलाते हैं. राघव के किरदार में दीपक तिजोरी ने अच्छा काम किया है. रही बात कहानी की तो वह कुनाल देशमुख के क्रिकेट की बदमाशियों की धूल से एक बार फिर बांबी बनाती है. जो कि बेहद भुरभुरी है. कुल जमा निकर्ष यह कि फिल्म नटवर लाल कुछ एक टुकड़ों में बेहतर होने के बावजूद बोदी है. रही सही कसर हिंदी फिल्मों का इबोला वायरस पूरा कर देता है. कहानी रफ्तार पकड़ती है और तभी एक गाना सरकारी दफ्तरों के चाय पानी खर्च की तरह अश्लील ढंग से ठेल दिया जाता है.

मुंबई में एक राजा है. छोटे मोटे फर्जीवाड़े कर अपने महल के लिए ईंटें जुटाता. बार में डांस करने वाली जिया से प्यार करता है. उस पर पैसे भी लुटाता है. प्यार करता है और उसे इस दुनिया से दूर ले जाना चाहता है. राजा का एक दोस्त और पार्टनर है. परिवार वाला. नाम है राघव. दोनों मिलकर एक बड़ा हाथ मारते हैं. और इस फेर में एक मर जाता है. दूसरा उसका बदला लेना निकलता है. इसमें मदद करता है एक बूढ़ा बरगद सा हो चला एक्स कॉनमैन जो अब हिमालय में माया से दूर बसर कर रहा है. इन सबका टारगेट है साउथ अफ्रीका के केपटाउन शहर में बैठा शातिव वर्धा यादव. ठगी का जरिया बनता है क्रिकेट. उठा पटक, पोल खोल, वफा और दगा, सब सरपट भागते हैं. बीच में मुहब्बत की चादर भी लहराती है गानों की डोर पर लटककर.

इमरान हाशमी को इस फिल्म में देखकर लगता है कि वह नींद में चल रहे हैं. कोई उन्हें यथार्थ की पिन मारे. या फिर शंघाई की डीवीडी दिखा दे. और उनके मेकअप मैन को भी एक पर्ची थमा दे साथ के साथ. थोड़ा फाउंडेशन कम खर्च किया करो भइया. हुमैमा मलिक सिर्फ पड़ोसी जमीन से आई सबसे महंगी मॉडल ही नहीं है. उन्हें एक्टिंग का एबीसी भी आता है. दुआ करें कि उनकी वर्णमाला जेड तक पहुंचे. केके मेनन वर्धा के रोल में छिपी बर्फीली कमीनगी का भरपूर मुजाहिरा करते हैं. परेश रावल भी योगी के रोल को जिंदगी बख्शते हैं. बाकी स्टारकास्ट भी ठीक है.

फिल्म की कहानी कमजोर है. कई जगह अधूरी छोड़ दी गई लगती. स्क्रीनप्ले में कसावट का अभाव है. गाने ठूंसे गए लगते हैं. यही हाल पैशनेट प्रेम कहानी का भी है. नटवरलाल का स्टीरियोटाइप ऐसा है कि उसे विदूषक होना ही होगा. तभी उसके कारनामे सिहरन पैदा करने के बजाय लुत्फ देते नजर आएंगे. फिल्म राजा नटवर लाल इस मोर्चे पर भी ज्यादातर हिस्सों में हिलती डुलती नजर आती है.

डायरेक्टर कुनाल देशमुख की इस फिल्म की एक उपलब्धि फिल्म के कुछ एक चुटीले डायलॉग हैं. इसके अलावा बाकी सब पानी कम पेंदा ज्यादा है. ये पेंदा तब और दिखने लगता है, जब आखिर में लालच को सत्यनारायण की कथा की तर्ज पर एक मानवीय उद्देश्य का पैरहन पहनाया जाता है.

अगर वीकएंड पर मल्टीप्लेक्स या सिंगल स्क्रीन जाए बिना मंडे की शकल देखने का दिल नहीं करता, तो ये फिल्म देख लें. मगर मसालेदार उम्मीदों को घर छोड़कर जाएं.

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Source: aajtak.intoday.in

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