मूवी रिव्यू: 'देसी कट्टे' फिल्म को देखना समय, पैसे और दिमाग़ की बर्बादी

26 September, 2014 8:57 AM

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ऐसी फिल्म के बारे में क्या कहा जाए जिसके प्रमोशन की पहली लाइन थी- 'फिल्म ज़िला ग़ाज़ियाबाद के निर्देशक की पेशकश'. ज़िला ग़ाज़ियाबाद देखने के बाद लगा था कि उससे घटिया फिल्म बनना शायद मुमकिन नहीं है लेकिन इसे निर्देशक आनंद कुमार की प्रतिभा ही कहा जाएगा कि उन्होंने बुरी फिल्म बनाने में अपनी अपनी पिछली फिल्म का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है. देसी कट्टे क्यों बनाई गई है? और कोई भी इसे क्यों देखने जाए इन दोनों सवालों का कोई जवाब हो ही नहीं सकता?

कहानी के नाम पर इसमें दो दोस्त (जय भानुशाली और अखिल कपूर) हैं जो कानपुर के गैंग्सटर हैं जो बड़े गैंग लीडर आशुतोष राणा के लिए काम करते हैं. लेकिन किस्मत इन दोनों को आर्मी ऑफिसर सुनील शेट्टी के पास ले जाती है जो इन्हें देश के लिए कुछ करने को प्रेरित करता है. दोनों रायफल शूटिंग में मेडल पाने के लिए मेहनत में लग जाते हैं. इस बीच इन दो दोस्तों की आपस में भी दुश्मीन होती है और भी ना जाने क्या क्या होता है जिसे जानने की किसी को ज़रूरत नहीं है.

फिल्म के कई सीन तकनीकी रूप से किसी सस्ते टीवी सीरियल की तरह लगते हैं. फिल्म के कहानी जोड़-तोड़ से लिखी गई है और डायलॉग बहुत बचकाने हैं. सुनील शेट्टी ने पूरी कोशिश की है कि वो चक दे इंडिया के शाहरुख की तरह कुछ कर दिखाएं लेकिन स्क्रिप्ट और निर्देशक ने उन्हें बड़ा धोखा दे दिया है. फिल्म के सीन घिसे-पिटे हैं और जय भानुशाली, अखिल कपूर, साशा आगा और टिया बाजपेई बेअसर दिखे हैं.

इसे देखते हुए आपको महसूस होगा कि कहीं से देसी कट्टे मिल जाएं और आप खुद को शूट कर लें. इस फिल्म को देखना समय, पैसे और दिमाग़ की बर्बादी है. इस फिल्म से दूर रहें.

Source: abpnews.abplive.in

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