मूवी रिव्यूः प्रियंका चोपड़ा की बॉक्सर मैरीकॉम पर बनी बायोपिक मैरीकॉम

5 September, 2014 4:45 AM

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मूवी रिव्यूः प्रियंका चोपड़ा की बॉक्सर मैरीकॉम पर बनी बायोपिक मैरीकॉम

कभी बॉक्सिंग चैपिंयन रही मणिपुर की लड़की मैरीकॉम अब अपने गांव में दो जुड़वां बच्चे पाल रही है. गुस्से से भरी है क्योंकि जब वो नौकरी मांगने गई तो उसे हवलदार की नौकरी ऑफर की गई. मैरी नए सिरे से अपनी उपलब्धियों की फाइल संवार रही है, ताकि कहीं और अप्लाई कर सके. तभी उसका एक बच्चा रोने लगता है. मैरी फाइल छोड़ देती है. बच्चा उठा लेती है. बच्चा जिस अखबार पर बैठा था, उस पर मैरी का फोटो छपा था. वर्ल्ड चैंपियनशिप के फाइनल का फोटो. मैरी के फाइनल पंच का फोटो. मगर अब उस पर बच्चे ने सूसू कर दिया. अखबार रद्दी हो गया. और शायद करियर भी.

मगर मैरी वापसी करती है. पर फिल्मी ड्रामा और इमोशन का जो सूसू फिल्म की कहानी पर किया गया, उससे फिल्म मैरीकॉम वापसी नहीं कर पाती है. बच्चे की बीमारी या बाप की नाराजगी को जबरन बॉक्सिंग रिंग में मैरी की हार या जीत से जोड़ दिया जाता है.

फिल्म मैरीकॉम एक द्वंद्व की शिकार है. ये चीज उसकी ताकत भी बन सकता था बशर्ते कहानी ठीक से गढ़ी गई हो. मैरी एक औरत. मैरी एक बॉक्सर. दोनों लकीरें एक साथ नहीं चल सकतीं. मगर मैरी ऐसा करती है. इसी में उसका नायाबपन छिपा है. वो रिंग में मुकाबला करती है. पानीपूड़ी खाते हुए प्यार करती है. कोच की मर्जी के खिलाफ जाकर शादी करती है. बच्चे भी करती है. और फिर अपनी जिद के चलते वापसी भी. पर फिल्म मैरीकॉम में इन सब शेड्स को दिखाने के क्रम में कहानी अकसर सुस्त पड़ जाती है. उसमें सिर्फ तभी गति आती है, जब मैरी रिंग में होती है या अपने कोच के साथ प्रैक्टिस कर रही होती है. कहानी का ये ठहराव हमेशा बहुत प्रकट ढंग का होता है. बच्चे होने के बाद मैरी का अपने मेडल समेट बक्से में रखना. या फिर गर्म भगोना पकड़ हाथ जला लेना.

बहरहाल, मैरीकॉम सिर्फ एक औसत कहानी भर नहीं है. ये प्रियंका चोपड़ा की शानदार एक्टिंग का नमूना भी है. उन्होंने स्कूल की गुस्सैल लड़की, एक भावुक बेटी, एक मजबूत बॉक्सर और एक प्यारी पत्नी का रोल अच्छे से निभाया है. फिल्म को देख लगता है कि बॉक्सर मैरीकॉम का रोल प्रियंका से अच्छा शायद कोई निभा भी नहीं पाता. उनके चेहरे पर, खासकर प्रैक्टिस के वक्त या फेडरेशन के दफ्तर के बाहर इंतजार के वक्त जो एक परत के नीचे छिपा तीखापन नजर आता है, वह किरदार को बहुत यकीन देता है.

प्रियंका के कोच के रोल में नेपाल के नामी कलाकार सुनील थापा ने बहुत उम्दा काम किया है. उन्हें देखकर एक बारगी तो डोगा के किरदार वाली कॉमिक्स में उनके गुरु बने अदरक चाचा याद आते हैं. खल्वाट सिर, नुकीली फ्रेंच दाढ़ी और मूंछ, वर्जिश में तपा कुछ बूढ़ा हो चला मगर तना शरीर. सुनील ने एक कोच के भीतर के मां और बाप, दोनों ही पैरहन को उम्दा ढंग से ओढ़ा है.

प्रियंका के पति ओनलेर के रोल में दर्शन कुमार भी जमे हैं. बॉलीवुड को ऐसे ही ताजे चेहरों की दरकार है, जिन्हें एक्टिंग भी आती हो. फिल्म की बाकी स्टारकास्ट भी अच्छी है.

दिल ये जिद्दी है के अलावा बाकी गाने औसत हैं. खेल की फिल्मों में जबरन भारतीयता की गुणगान करने वाले गाने ठूंसने का चलन यहां भी है. मगर दर्शकों को फिल्म के बाद इन गानों की एक आध पंक्ति भी याद रह जाए तो बहुत है. चक दे का प्रेशर नजर आता है मैरीकॉम पर, इस हिसाब से.

फिल्म में नॉर्थ ईस्ट की कुछ नई लोकेशन हैं. बॉक्सिंग के सीन अच्छे से शूट किए गए हैं. मगर ओवर ऑल मैच के पहले की तैयारी, खिलाड़ियों के आपसी रिश्ते और इन दौरान उपजते नेह, तनाव और बनती रणनीति को डायरेक्टर उमंग कुमार अच्छे से नहीं दिखा पाए. मैरीकॉम की एक दिक्कत ये भी है कि ये एक साथ सब कुछ दिखाने की कोशिश करती है. फेडरेशन की पॉलिटिक्स, पिताओं का बेटियों के प्रति व्यवहार, शादी के बाद औरत पर ज्यादा बोझ या फिर खिलाड़ियों का आपसी मनमुटाव. इससे फिल्म की एकाग्रता भंग होती है. और वह कई जगह सुस्त और बोझिल हो जाती है. स्पोर्ट्स फिल्म के लिए खास तौर पर यह अक्षम्य है. और महापाप होता है आखिर में, जब बिल्कुल बॉलीवुड स्टाइल में बच्चे का ऑपरेशन चल रहा है और मैरी रिंग में पिट रही है.

मैरीकॉम एक नेक इरादे और महान शख्सियत के नाम पर बनाई गई औसत से कुछ ऊपर फिल्म है. अगर आप खेलों के प्रति जुनून रखते हैं या अपने बच्चों में मोबाइल फोन छोड़कर मैदान पर पसीना बहाने का उत्साह दौड़ाना चाहते हैं, तो ये फिल्म देख सकते हैं. यह फिल्म उन पतियों को भी देखना चाहिए जो अपनी पत्नियों को काम करने की 'इजाजत' देकर खुद को महान समझ बैठते हैं. पर वे ये भूल जाते हैं कि साथ निभाने के वादे सिर्फ इतने तक सीमित नहीं. फिल्मी पैमाने पर इसे बिखरी कहानी और ढीले स्क्रीनप्ले ने कमजोर कर दिया है, नतीजतन, उम्दा एक्टिंग भी इसे उबार नहीं पाई.

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Source: aajtak.intoday.in

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