मूवी रिव्यू: लंबी कहानी और रोमांस ने कर दिया अक्षय की हॉलीडे को सुस्त

5 June, 2014 1:04 PM

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मूवी रिव्यू: लंबी कहानी और रोमांस ने कर दिया अक्षय की हॉलीडे को सुस्त

एक समय था जब अक्षय कुमार को हिट कुमार कहा जाता था. उनकी क्या एक्शन, क्या कॉमेडी, क्या रोमांटिक ड्रामा, हर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त मुनाफा कमाती थी. मगर फिर दौर आया चांदनी चौक टु चाइना जैसी फिल्मों का, टशन का. और ये सिलसिला बॉस ऐसा चला कि पनौती जाए नहीं जा रही. इन्हीं सब को ध्यान में रखते हुए गजनी फेम डायरेक्टर मुरुगदॉस ने अक्षय कुमार को फिल्म 'हॉलीडे ए सोल्जर इज नेवर ऑफ ड्यूटी' में थोड़ा स्लिम, स्मार्ट और फास्ट अवतार में पेश किया है. घड़ी घड़ी पंच लाइन मारने के लालच से बचे हैं वह. मगर अक्षय कुमार की फ्रेशनेश और कहानी की रफ्तार को जबरदस्ती का रोमैंटिक एंगल, गाने और 3 घंटे की ड्यूरेशन मार सा देती है.

कहानी भी कोई बहुत ज्यादा कमाल की नहीं है. मगर बिल्कुल फ्लैट भी नहीं है. कुल मिलाकर हॉलीडे एक ऐसी फिल्म बन जाती है, जिसके बारे में वर्डिक्ट फिफ्टी फिफ्टी जाता है. अगर आप अक्षय, सोनाक्षी, मसाला फिल्मों, एक्शन और देशभक्ति बनाम आतंकवाद की थीम के फैन हैं, तो ये फिल्म आपके लिए है. अगर आप स्लिम, स्मार्ट और विटी फिल्मों के फैन हैं, तो भूलकर भी थिएटर का रुख न करें.

कहानी कुछ यूं ही कि कैप्टन विराट बक्शी (अक्षय कुमार) छुट्टियों पर घर आया है. यहां घर वाले उसकी शादी सायबा (सोनाक्षी सिन्हा) से तय करवाते हैं. दोनों तरफ से हालात के चलते इनकार इकरार चलता रहता है. इस बीच विराट अपने पुलिस इंस्पेक्टर दोस्त (सुमित राघवन) की मदद के फेर में एक आतंकवादी नेटवर्क तक पहुंच जाता है. इसके बाद शुरू होता है उसका मिशन. एक तरफ हैं आतंकवादी जो स्लीपर सेल के जरिए मुंबई में सीरियल ब्लास्ट करना चाहते हैं. दूसरी तरफ है आर्मी की स्पेशल यूनिट का मेंबर विराट, जो कभी अकेले तो कभी अपने फौजी साथियों के साथ इनके पर कतरने में लगा रहता है. बाद में इस टेटर स्टोरी में फैमिली एंगल, शहादत, विछोह जैसे और भी तत्व आकर जुड़ जाते हैं.

अक्षय कुमार के कंधों पर ये फिल्म टिकी है. वह अपनी रेंज में रहकर काम करते हैं और अरसे बाद ठीक लगते हैं. सोनाक्षी सिन्हा के हिस्से बस ग्लैमर और रोमांस के बक्से टिक करना आया. मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में बने रहने के लिए शायद इस तरह के रोल करना अनिवार्य रहता होगा. वर्ना लुटेरा जैसी फिल्म करने वाली एक्ट्रेस ये सब क्यों करे.

अक्षय कुमार के कंधों पर ये फिल्म टिकी है. वह अपनी रेंज में रहकर काम करते हैं और अरसे बाद ठीक लगते हैं. सोनाक्षी सिन्हा के हिस्से बस ग्लैमर और रोमांस के बक्से टिक करना आया. मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में बने रहने के लिए शायद इस तरह के रोल करना अनिवार्य रहता होगा. वर्ना लुटेरा जैसी फिल्म करने वाली एक्ट्रेस ये सब क्यों करे.

फिल्म के मेन विलेन के रोल में डेब्यू किया है फरहाद ने. मगर उनका डब्बा भी ऑलमोस्ट गुल ही रहा. फ्लैट से एक्सप्रेशन को बैकग्राउंड स्कोर के सहारे उभारा नहीं जा सकता. अक्की के दोस्त के रूप में सुमित राघवन ठीक लगे हैं. टीवी का ये चेहरा सिर्फ विपुल शाह कैंप की फिल्मों में ही क्यों दिखता है ये समझ नहीं आता.

फिल्म के ज्यादातर गाने कहानी के अहम मोड़ पर अचानक से आ जाते हैं. जैसे आप तेज रफ्तार से दौड़ रहे हों और मोड़ पर पड़े गोबर पर आपका पैर पड़ जाए. अरे भाई, एक क्राइम थ्रिलर बना रहे हो, तो रफ्तार का ख्याल रखो न. सबको पता है कि फौजी भी प्यार करते हैं. मगर जिग्सा पजल सॉल्व करते करते वह गुंबदों के ऊपर आज दिल शायराना लगता है तो नहीं गाने लगते न.

मुरुगदॉस जी, अब हिंदी इंडस्ट्री कुछ आगे बढ़ गई है. बॉस वाले अक्षय खारिज होते हैं और स्पेशल 26 वाले अक्षय को सराहा जाता है. हालांकि डायरेक्टर को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि 3 घंटे की फिल्म के बावजूद उन्होंने गानों के अलावा बाकी जगह स्पीड स्लो नहीं होने दी. फिर अब पब्लिक वाकई इतनी लंबी फिल्म देखने की आदी नहीं रही. ऐसा मुझे लगता है. तो मेरे ख्याल से इस हॉलीडे ये फिल्म देखना तभी अफोर्ड करें, जब ऊपर बताई वजहों के दायरे में आते हों.

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Source: aajtak.intoday.in

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