मूवी रिव्यू: विद्या बालन की अच्छी एक्टिंग के लिए देखिए 'बॉबी जासूस'

5 July, 2014 5:40 AM

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फिल्म ‘बॉबी जासूस’ एक बात पर मुहर लगाती है कि जिस फिल्म में विद्या बालन होती हैं उसमें हीरो की कमी महसूस नहीं होती. अपने हैदराबादी किरदार में विद्या हंसती हैं, रोती हैं, एक्शन करती हैं और कुल मिलाकर एक कमज़ोर फिल्म को भी अपने कंधों पर उठाकर उसमें जान फूंक देती हैं.

अपने पिता की नाराज़गी के बावजूद हैदराबाद के मुग़लपुरा की बिल्कीस बानो उर्फ़ ‘बॉबी’ (विद्या बालन) जासूस बनने की ख़्वाहिश रखती है. वो मोहल्ले के लोगों के छोटे-मोटे केस सुलझाती है. लेकिन बड़ी डिटेक्टिव एजेंसी उसे नौकरी दिए बिना अपने ऑफिस से निकाल देती है. इसी दौरान उसके पास एक अमीर आदमी अनीस ख़ान (किरण कुमार) एक काम लेकर आता है. बॉबी को ख़ान के लिए एक लड़की की तलाश करनी है. बॉबी बड़ी मुश्किल से उस लड़की को ढूंढती है. बदले में उसे मोटी रकम मिलती है. ख़ान इसके बाद भी बॉबी को काम देता है. लेकिन बॉबी को शक है कि वो जो काम उससे करवा रहा है, उसमें भारी गड़बड़ है. इस कहानी के बीच में तसव्वुर (अली फ़ज़ल) के साथ रोमांस और कॉमेडी भी चलती है.

फिल्म की कहानी कॉमेडी से शुरू होती है और इंटरवल तक आते आते ये थ्रिलर बन जाती है. लेकिन फिर शायद निर्देशक के दिमाग़ में अचानक कन्फ्यूज़न शुरू होता है. इसमें बॉबी के परिवार की कहानी, उसका रोमांस और सस्पेंस सब ठूंसने की कोशिश होती है. ये कभी रोमांटिक कॉमेडी लगती है तो कभी सस्पेंस फिल्म. ऐसा लगता है कि केस सुलझने पर किसी बड़े रहस्य से पर्दा उठेगा लेकिन फिर फिल्म का क्लाईमैक्स बेहद निराश करता है. ना तो बड़ा सस्पेंस खुलता है, ना ही ऐसा कोई इमोशनल सीन है जिसे देखकर आपको लगे कि वाक़ई दो घंटे की मेहनत के बाद कुछ अच्छा हुआ.

फिल्म की ऱफ़्तार तेज़ है और विद्या बालन ने दिखा दिया है कि हिंदी सिनेमा में हीरोइन-प्रधान फिल्मों के लिए सबसे पहली पसंद वो क्यों होती हैं. विद्या हर सीन में हैदराबादी ही लगी हैं. उनके स्क्रीन प्रेज़ेंस और स्वभाविक अभनिय का कमाल है कि फिल्म की कमज़ोरियों पर आपका ध्यान ही नहीं जाता. हीरो अली फ़ज़ल ने अपना रोल बहुत अच्छा निभाया है लेकिन विद्या की स्क्रीन प्रेज़ेंस के सामने वो हल्के लगते हैं. विद्या की उम्र का लगने के लिए ही शायद उन्होंने दाढ़ी बढ़ाई है.

विद्या की पिछली बड़ी हिट फिल्मों ‘द डर्टी पिक्टर’ और ‘कहानी’ से तुलना करें तो इस फिल्म में ड्रामा और बड़े सीन्स की कमी है. ये फिल्म बेहद सरल और सपाट है और यही इसकी ख़ासियत भी है. निर्देशक समर शेख़ ने मनोरंजन का पूरा ध्यान रखा है. लेकिन अंत कमज़ोर और कन्फ़यूज़्ड लगता है. फिल्म की पृष्ठभूमि हैदराबाद की है और लगभग सारे किरदार मुस्लिम हैं, लेकिन कहानी में कहीं भी उनके धार्मिक पहचान या मुद्दे को लेकर सीधा कोई सीन या डायलॉग नहीं हैं. ये बात इस फिल्म को आम हिंदी फिल्मों से अलग करती हैं. ये सब आम किरदार है जो बस कहानी को आगे बढाते हैं.

अलग अलग भेस धरकर और अपने अच्छे अभिनय से विद्या आसानी से आपके चेहरे पर मुस्कान ले आती हैं. बॉबी जासूस सिर्फ़ उनकी वजह से देखी जानी चाहिए.

Source: abpnews.abplive.in

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