'हिरोइन के कम कपड़े, विलेन की क्या ज़रूरत'

14 October, 2014 4:56 AM

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"मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं विलेन बनूंगा. लेकिन जो हुआ अच्छा हुआ. कभी-कभी तो मैं हीरो से ज़्यादा कमाता था."

ऐसा कहना है 80 के दशक में बहुत सी फ़िल्मों में हीरो से मार खाने वाले विलेन रंजीत का.

रंजीत की फ़िल्म 'स्पार्क' बीत हफ़्ते रिलीज़ हुई. इसमें वो ऐक्टर रजनीश दुग्गल के पिता की भूमिका निभा रहे हैं और एक नेक आदमी की भूमिका में हैं.

ऐक्टर रंजीत की मानें तो हीरो की पिटाई का असर उनके निजी जीवन पर भी पड़ा.

रंजीत ने कभी नहीं सोचा था कि वह विलेन बनेंगे पर उनके मुताबिक़ जो होता है, अच्छा ही होता है.

वह याद करते हुए बताते हैं, “उस ज़माने में विलेन हीरो से कम नही था. उसके आने पर तालियां बजतीं, सबको टेंशन होती थी. अगर फ़िल्म में मैं नहीं होता तो लोग कहते थे कि यार इस फ़िल्म मे मज़ा नहीं आया."

उन्होंने कहा, "मैं कभी-कभी तो हीरो से ज़्यादा कमाता था. हीरो लड़की को पटाने के लिए लॉन्ग कट लेता था और मैं शॉर्ट कट."

रंजीत के मुताबिक़, "मैं जहां जाता लोग अजीब निगाह से देखते. अपनी बीवीयों को बोलते संभलकर रहो. जब अपनी बेटी के साथ जाता तो भी लोग अजीब निगाह से देखते. ये नफ़रत ही मेरा इनाम है."

रंजीत का मानना है कि अब लड़कियां इतने कम कपड़े पहनती हैं कि उनके रोल की ज़रूरत ही नहीं है.

वह कहते हैं, "अब वक्त बहुत बदल गया है. विलेन बनने मे कोई मज़ा नही. आज कल अश्लीलता बहुत है. अब हीरो ही विलेन निलकते हैं.”

रंजीत का असली नाम गोपाल बेदी है और वह पंजाब से हैं. पर उनका नाम रंजीत कैसे पड़ा?

वह बताते हैं, "मेरी पहली फ़िल्म थी रेशमा और शेरा जिसमें सुनील दत्त थे. उनके साथ बैठकर ये तय हुआ कि मेरा ऑन स्क्रीन नाम- रंजीत होगा."

उन्होंने कहा, "मुझे याद है छह बजे के बाद मेरे कई समकालीन कलाकार शराब पीते थे लेकिन मैं नहीं. मैं खुशनसीब हूं कि मैने ज़िंदगी के बेहतरीन पल जिए. लोगों का प्यार मिला."

Source: bbc.co.uk

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